पाठशाला में आते हुए-महिलाएँ |
कीट अवलोकन व निरिक्षण |
मिलीबग |
" लपरो-मनियारी हे! मनै लगै प्यारी हे!!
हमनै खेत में बैठी पाईये हे!
म्हारी बाड़ी के कीड़े खाईये हे!!!!"
अवलोकन |
डा सुरेन्द्र दलाल के लिए यह अपने आप में एक अनोखा अनुभव था| किसी भी खेत पाठशाला के लिए पुरुषों में तो इतना हौंसला व चाव उसने कहीं भी कभी नहीं देखा था|
हरा तेला |
इस पाठशाला की औपचारिक शुरुवात करते हुए डा.सुरेन्द्र दलाल ने उपस्तिथ महिलाओं को इस खेत पाठशाला के लक्ष्य और उद्देश्य विस्तार से बताये| इसके राजनितिक एवं व्यापारिक मायने महिलाओं को समझाते हुए किसान और कीटों की इस अंतहीन जंग के चक्रव्यूह में फंसे किसान रूपी अभिमन्यु को बाहर निकालने के लिए बेहतर सैनिकों के रूप में विकसित होने की अपील की| उन्होंने हरियाणा की धरती पर लड़ी गई सबसे घातक जंग महाभारत की तुलना पिछले तीन दशकों से किसानों व् कीटों के मध्य जारी इस कीट-युद्ध से करते हुए महिलाओं को बताया की महाभारत की लड़ाई इतनी भयावह थी कि आज भी हिन्दू इस जंग की किताब को अपने घर में रखते हुए डरते हैं| लेकिन फिर भी यह लड़ाई सिर्फ अठारह दिन में अपने मुकाम पर पहुँच गई थी| पर किसान व् कीटों की यह जंग पिछले पच्चीस सालों से रुकने का नाम नही ले रही| इन दोनों जंगों के मुख्य भेदों पर चर्चा करते हुए डा.दलाल ने बताया कि महाभारत की लड़ाई में दोनों पक्षों को एक दुसरे की सही व् ठोस जानकारी थी| एक दुसरे की रिश्तेदारियों व् गतिविधियों का पूरा भेद था| पांडवों को कौरवों की सही पहचान, पुरे भेद व इनकी सारी कमजोरियों का इल्म था| इसी तरह कौरवों को भी पांडवों के बारे में तमाम किस्म की जानकारियां थी| जबकि इस कीटों व किसानों की वर्तमान जंग में किसानों व इनके नेतृत्व को कीटों की सही पहचान व भेद मालूम नही है| दूसरा मुख्य फर्क हथियारों को लेकर है| महाभारत में हर योद्धा के पास दो तरह के हथियार थेः सुरक्षात्मक हथियार व् जानलेवा हथियार| लेकिन आज हमारे किसानों के पास तो सिर्फ कीटों को मारने के मारक हथियार भर ही हैं अर् वो भी बेगाने| इसीलिए तो यह जंग ख़त्म होने का नाम नही ले रही| अत: हमारी इस पाठशाला में मिलजुल कर सारा जोर कीटों एवं इनकी विभिन्न अवस्थाओं की सही पहचान करने, इनके भेद जानने तथा इस जंग में अपने खुद के हथियार विकसित करने पर रहेगा|
डा. दलाल ने आगे बात बढ़ाते हुए इन महिलाओं को यह भी बताया कि हमारे कीट-वैज्ञानिक कीट उन रीढ़विहीन संधिपादों को कहते हैं जिनका शरीर तीन भागों में बटा हुआ हो तथा छ: जोड़ी टांग हो. मतलब इनके शरीर के तीन भाग सिर, धड व पेट होते हैं. कीट की आँखें, मुहं व एंटीना आदि इसके सिर पर होते है. इनकी टाँगें व पंख धड पर होते हैं. कीटों की छ: जोड़ी टाँगें व अमूमन दो जोड़ी पंख होते हैं. आमतौर पर कीटों के जीवन की अंडा, लार्वा, प्यूपा व प्रौढ़ नामक चार अवस्थाएं होती हैं. भोजन की तासीर के अनुसार कीट दो प्रकार के होते हैं-मांसाहारी( लाभदायक ) व शाकाहारी( नुकशानदायक )| इस दुनिया में मांसाहारी कीटों की गिनती किसान मित्रों के रूप में होती है जबकि शाकाहारी कीटों को किसानों का दुश्मन समझा जाता है. कीट चाहे मांसाहारी हों या शाकाहारी पर मुहं की बनावट के हिसाब से मुख्य रूप से दो ही प्रकार के होते हैं-चूसक कीट व चर्वक कीट | कीटों का खून वायु के संपर्क में आने पर भी जमता नही.
इसके बाद महिलाओं ने मिनी, कमलेश, राजवंती, गीता सरोज व् सुदेश के नेतृत्व में ग्रुपों का गठन किया व् अवलोकन व निरिक्षण के लिए पांच-पांच की टोलियों में कपास के खेत में उतरी| हरेक टोली के पास छोटे-छोटे कीट देखने के लिए मैग्नीफाईंग-ग्लास थे| लिखने के लिए कापी और पैन था| एक घंटे की माथा-पच्ची के बाद महिलाओं ने चार्टों पर रिपोर्ट तैयार की व् सबके सामने प्रस्तुत की| रिपोर्टों से निष्कर्ष निकला कि आज के दिन इस कपास के खेत में हरे-तेले, सफ़ेद-मक्खी, चुरड़े व मिलीबग देखे गये हैं परन्तु इनकी संख्या काफी कम है| अभी ये रस चूसकर हानि पहुँचाने वाले कीड़े कपास की फसल को हानि पहुँचाने की स्थिति में नही हैं। इनके अलावा इस खेत में महिलाओं ने आज दो तरह के टिड्डे भी देखे जो पत्तों को खा रहे थे। जिला जींद के कीट विशेषज्ञ किसान मनबीर रेड्हू व रणबीर मलिक इस पाठशाला में महिलाओं को प्रशिक्षित करने के लिये हर मंगलवार को नियमित तौर पर आया करेंगे।
महिलाएं जिन्होंने इस खेत पाठशाला में दाखिला लिया:
- अनीता
- सुंदर
- राजबाला
- बिमला
- प्रकाशी
- संतरा
- केलो
- बीरमती
- सरोज
- राजवंती
- नन्ही
- मिनी
- रानी
- कमलेश मलिक
- बिमला पंडित
- कमला
- कविता
- बिमला
- मीना
- लाड्डो
- संतरों
- सरोज
- प्रोमिला
- अंग्रेजो
- कृष्णा
- सुदेश
- कमलेश
- गीता
- बिमला
- सरोज
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