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Wednesday, October 3, 2012

देश को जहर से मुक्ति दिलवाने के लिए लड़ाई लड़ रही हैं महिलाएं

 महात्मा गांधी ने सत्य,अंहिसा व चरखे को अपना हथियार बनाकर देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी थी। उसी प्रकार ललीतखेड़ा व निडाना की महिलाएं भी बापू के रास्ते पर चलकर देश को जहर से मुक्ति दिलवाने के लिए लड़ाई लड़ रही हैं। इस लड़ाई में विजयश्री के लिए इन महिलाओं ने कीट ज्ञान को अपना हथियार बनाया है। महिलाओं ने कीट विज्ञान के सहारे अपना स्थानीय कीट ज्ञान पैदाकर किसानों को एक नया रास्ता दिखाकर बापू के विचारों और औजारों की सार्थकता को सिद्ध किया है। यह बात बराह कलां बारहा खाप के प्रधान कुलदीप ढांडा ने कीट कमांडो महिलाओं के कीट ज्ञान की प्रशांसा करते हुए कही। ढांडा बुधवार को ललीतखेड़ा गांव में आयोजित महिला किसान पाठशाला में बोल रहे थे। 
ढांडा ने महिलाओं की कीट ढुंढऩे की दक्षता व कौशल की महता को स्वीकार करते हुए कहा कि कीटों से महिलाओं का पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा वास्ता रहा है। इसके अलावा महिलाएं बारीक काम भी करती रहती हैं। इसलिए भी छोटे-छोटे कीट इनकी पकड़ में जल्दी ही आ जाते हैं। पाठशाला में महिला किसानों ने कीटों की गिनती, अवलोकन, सर्वेक्षण व निरीक्षण के बाद कीट बही खाता तैयार किया। मास्टर ट्रेनर अंग्रेजो ने बताया कि कीट अवलोकन के दौरान उन्होंने कपास की फसल में काला बाणिया नजर आया है, जो कपास के फावे के बीच कच्चे बीज के पास अपने अंड़े देता है। इसके निम्प व प्रौढ़ कच्चे बीज का रस चूसकर अपना जीवनचक्र चलाते हैं। वैसे तो दुनिया में इन कीटों को खाने वाले कम ही कीट देखे गए हैं, लेकिन यहां की महिलाओं ने काले बाणिये के बच्चे व अंड़ों का भक्षण करते हुए लेड़ी बिटल का गर्भ ढूंढ़ लिया है। इसके अलावा महिलाओं ने सुंदरो, मुंदरो नामक जारजटिया समूह के मासाहारी कीटों को भी ढूंढ़ा है। महिलाओं ने कपास की फसल में चेपे के आक्रमण की शुरूआत के साथ ही चेपे का भक्षण करने वाले ङ्क्षसगड़ू नामक लेड़ी बिटल के बच्चे भी देखे। 
कीट ज्ञान में हासिल की माहरत
ललीतखेड़ा व निडाना गांव की महिलाओं ने अपने कीट ज्ञान में वृद्धि करने के लिए लैंस, कापी व पैन को अपना औजार बनाया है। फसल में कीट सर्वेक्षण के दौरान महिलाएं लैंस की मार्फत फसल में मौजूद छोटे-छोटे कीटों की पहचान कर उनके क्रियाकलापों को अपनी नोट बुक में दर्ज कर अपने कीट ज्ञान में वृद्धि करती हैं। अपनी सुझबुझ व पैनी नजर से इन महिलाओं ने कीट ज्ञान में माहरत हासिल की है। 
उर्वकों का कम प्रयोग कर लेती हैं अच्छा उत्पादन
 फसल में कीटों का निरीक्षण करती महिलाएं।
 लाल बाणिये का शिकार करते हुए मटकू बुगड़ा। 
इन मास्टर ट्रेनर महिलाओं ने कीट ज्ञान ही नहीं बल्कि कम उर्वरकों का प्रयोग कर अच्छा उत्पादन लेने के गुर भी सीखे हैं। महिला किसानों द्वारा फसल में उर्वक सीधे जमीन में डालने की बजाये उर्वरकों का घोल तैयार कर पत्तों पर उनका छिड़काव किया जाता है। इससे उर्वरकों की बचत भी होती है और उत्पादन में भी वृद्धि होती है। इसमें सबसे खास बात यह है कि इन महिलाओं ने पांच माह की फसल में अभी तक एक छटाक भी कीटनाशक का प्रयोग नहीं किया है। 
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Wednesday, September 19, 2012

समय पर पौधों को पर्याप्त खुराक देकर पैदावार में की जा सकती है बढ़ोतरी


 
    ललीतखेड़ा गांव में बुधवार को पूनम मलिक के खेत में महिला किसान पाठशाला का आयोजन किया गया। महिलाओं ने पाठशाला में कीट सर्वेक्षण के बाद कीट बही खाता तैयार किया। कीट सर्वेक्षण के साथ-साथ महिलाओं ने कपास के पौधों, फूलों, टिंडों व बोकियों की गिनती कर पौधों का भी बही खाता तैयार किया। महिलाओं ने 6 ग्रुप बनाकर 10-10 पौधों का सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण के बाद महिलाओं ने जामुन के पेड़ के नीचे बैठकर चार्ट पर अपना बही खाता तैयार किया। मास्टर ट्रेनर अंग्रेजो ने सर्वेक्षण के बाद तैयार किए गए आंकड़ों की तरफ इशारा करते हुए बताया कि कपास के इस खेत में इस सप्ताह शाकाहारी कीटों की संख्या नामात्र है। इस सप्ताह फसल में लाल व काला बानिया ही नजर आए हैं। पूनम मलिक ने महिलाओं को बताया कि उन्होंने कीट सर्वेक्षण के दौरान खेत में लाल व काला बानिए के अंडे भी देखे हैं। पूनम ने बताया कि लाल बानिया अपने अंड़े कपास के पौधे के पास गले-सड़े पत्तों के नीचे व जमीन के ऊपर देता है तथा काला बानिया कपास के खिले हुए टिंडों के अंदर देता है। सविता ने महिलाओं द्वारा किए गए कपास के पौधों के सर्वेक्षण के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इस प्रयोगधीन खेत में एक पौधे पर औसतन 80 टिंडे, 2 फूल व 22 बोकियां मिली हैं। सविता ने बताया कि अगर इस समय पौधों को पर्याप्त खुराक मिल जाए तो बोकियों, फूलों व टिंडों को अच्छी तरह विकसित कर अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है। मीना मलिक ने बताया कि पाठशाला में आने वाली महिलाओं को अभी तक अपने खेत में एक बूंद भी कीटनाशक के प्रयोग की जरुरत नहीं पड़ी है। महिलाओं ने बताया कि उनके लिए बड़ी खुशी की बात है कि उन्होंने अपनी मेहनत के बलबूते खुद का ज्ञान पैदा कर कीटनाशकों को धूल चटा दी है। 

टीवी के माध्यम से सिखाएंगी जहर से मुक्ति के गुर

 पाठशाला में मास्टर ट्रेनर के साथ विचार-विमर्श करती महिलाएं।

: कपास की फसल में कीट सर्वेक्षण करती महिलाएं। 
महिला किसान पाठशाला के अलावा महिलाएं टीवी के माध्यम से भी किसानों के साथ अपने अनुभव बांटेंगी। वीरवार को लोकसभा चैनल पर सायं 5.30 बजे ‘ज्ञान दर्पण’ कार्यक्रम में, शुक्रवार को सायं 5.30 बजे ‘सार्इंस दिस वीक’ कार्यक्रम में तथा सोमवार को डीडी नैशनल चैनल पर सायं 6.30 बजे ‘कृषि दर्शन’ कार्यक्रम में किसानों को कीट नियंत्रण के माध्यम से जहर से छुटकारा पाने के गुर सिखाएंगी। 
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Wednesday, August 29, 2012

दूरदर्शन की टीम ने शूटिंग को दिया अंतिम रूप


   बेजुबान कीटों को बचाने के लिए जिले के निडाना गांव की धरती से उठी आवाज अब विदेशों में भी गुंजेगी। किसानों की आवाज को दूसरे देशों तक पहुंचाने में दिल्ली दूरदर्शन की टीम इनका माध्यम बनी है। दिल्ली दूरदर्शन की टीम अपने कृषि दर्शन कार्यक्रम की रिकार्डिंग के लिए मंगलवार को निडाना गांव के किसानों के बीच पहुंची थी। टीम ने मंगलवार को निडाना गांव में किसान खेत पाठशाला तथा बुधवार को ललीतखेड़ा की महिला किसान खेत पाठशाला की गतिविधियों को कैमरे में शूट किया। बुधवार को हुई बूंदाबांदी के बीच भी कार्यक्रम की शूटिंग चली और ललीतखेड़ा की महिला किसान खेत पाठशाला में शूटिंग को अंतिम रुप देकर टीम अपने गंतव्य की तरफ रवाना हो गई। दिल्ली दूरदर्शन द्वारा 4 सितंबर को सुबह 6.30 बजे कार्यक्रम का प्रसारण किया जाएगा और यह कार्यक्रम 165 देशों में प्रसारित होगा।
निडाना गांव के किसानों द्वारा जलाई गई कीट ज्ञान की मशाल अब देश ही नहीं बल्कि विदेश के किसानों की राह का अंधेरा दूर कर उन्हें एक नया रास्ता दिखाएगी। इस रोशनी को विदेशों तक पहुंचाने के लिए दिल्ली दूरदर्शन की टीम पिछले दो दिनों से अपने पूरे तामझाम के साथ निडाना में डेरा डाले हुए थी। दूरदर्शन की इस टीम में रिपोर्टर विकास डबास, कैमरामैन सर्वेश व राकेश के अलावा 84 वर्षीय वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डा. आरएस सांगवान भी मौजूद थे। कृषि वैज्ञानिक डा. आरएस सांगवान ने मंगलवार को निडाना गांव में चल रही किसान खेत पाठशाला में पहुंचकर कीट कमांडो किसानों के साथ सीधे सवाल-जवाब किए और दूरदर्शन की टीम ने उनके अनुभव को अपने कैमरे में कैद किया। अलेवा से आए किसान जोगेंद्र ने कृषि वैज्ञानिक को अपने अनुभव के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि वह 1988 से खेतीबाड़ी के कार्य से जुड़ा हुआ है। खेतीबाड़ी के कार्य से जुड़ने के साथ ही उसने अपने खेतीबाड़ी के सारे खर्च का रिकार्ड भी रखना शुरू किया हुआ है। 1988 से लेकर 2011 तक वह अपने खेतों में 70 लाख के पेस्टीसाइड डाल चुका है। लेकिन इस बार उसने निडाना के किसानों के साथ जुड़ने के बाद अपने खेत में एक छंटाक भी कीटनाशक नहीं डाला है और अब वह खुद भी कीटों की पहचान करना सीख रहा है। निडानी के किसान जयभगवान ने बताया कि वह 14 वर्ष की उम्र से ही खेती के कार्य में लगा हुआ है। जयभगवान ने बताया कि उनके एक रिश्तेदार की पेस्टीसाइड की दुकान है और वह हर वर्ष उससे कंट्रोल रेट पर दवाइयां खरीदता था। कंट्रोल रेट पर दवाइयां मिलने के बाद भी उसका हर वर्ष दवाइयों पर 80 हजार रुपए खर्च हो जाता था। लेकिन पिछले दो वर्षों से उसने इस मुहिम से जुड़ने के बाद कीटनाशकों का प्रयोग बिल्कुल बंद कर दिया है। खरकरामजी के किसान रोशन ने बताया कि वह 10-12 एकड़ में खेती करता है, लेकिन वह अपने खेत में सुबह पांच बजे से आठ बजे तक सिर्फ तीन घंटे ही काम करता है। इसके बाद अपनी ड्यूटी पर चला जाता है। रोशन ने बताया कि अधिक पेस्टीसाइड के प्रयोग से पैदावार में बढ़ोतरी नहीं होती। पैदावार बढ़ाने में दो चीजें सबसे जरुरी हैं। पहला तो सिंचाई के लिए अच्छा पानी और दूसरा खेत में पौधों की पर्याप्त संख्या। अगर खेत में पौधों की पर्याप्त संख्या होगी तो अच्छी पैदावार निश्चित है। सिवाहा से आए किसान अजीत ने बताया कि वह अपनी जमीन ठेके पर देता था। जिस किसान को वह ठेके पर जमीन देता था, वह फसल में अंधाधूंध कीटनाशकों का प्रयोग करता था। जहरयुक्त भेजन के कारण कैंसर की बीमारी ने उसे अपने पंजों में जकड़ लिया और पिछले वर्ष उसकी मौत हो गई। इसलिए इस वर्ष उसने अपने खेत ठेके पर नहीं देकर स्वयं खेती शुरू की है और उसने भी कीट ज्ञान अर्जित कर अपने खेत में एक बूंद भी कीटनाशक नहीं डाला है। उसके खेत में इस वर्ष शाकाहारी व मासाहारी कीट भरपूर संख्या में मौजूद हैं। लेकिन इन कीटों से उसकी फसल को रत्ती भर भी नुकसान नहीं हुआ है। इसके बाद बुधवार को टीम ललीतखेड़ा गांव में महिला किसान पाठशाला में पहुंची और यहां महिलाओं से भी उनके अनुभव के बारे में जानकारी जुटाई। महिलाओं ने कीटों पर लिखे गीत सुनाकर टीम का स्वागत किया। टीम ने महिलाओं द्वारा लिखे गए तीन गीतों की भी रिकार्डिंग की। इस दौरान टीम ने निडाना के किसान रणबीर द्वारा चार एकड़ में बोई गई देसी कपास के शॉट भी लिए।
किसानों से सवाल करते कृषि वैज्ञानिक डा. आरएस सांगवान।

किसानो से बातचीत करते कृषि 

कृषि दर्शन कार्यक्रम के लिए किसानों के अनुभव को शूट करते टीम के सदस्य।
कृषि वैज्ञानिक को उपहार भेंट करती महिला 

कृषि वैज्ञानिक ने थपथपाई किसानों की पीठ

टीम के साथ आए कृषि वैज्ञानिक डा. आरएस सांगवान ने किसानों द्वारा शुरू किए गए इस कार्य की खूब सराहना की। किसानों की पीठ थपथपाते हुए सांगवान ने कहा कि उनकी यह मुहिम एक दिन जरुर शिखर पर पहुंचेगी और दूसरे किसानों को राह दिखाएगी। उन्होंने कहा कि इंसान को प्रकृति के साथ छेडछाड़ नहीं करनी चाहिए। आज मौसम में जो परिवर्तन आ रहे हैं, वह सब प्रकृति के साथ हो रही छेड़छाड़ का ही नतीजा है।

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Wednesday, August 22, 2012

कीटनाशकों से लड़ने के लिए कीटों को बनाया अचूक हथियार

                  लोगों की थाली से जहर कम करने के लिए चलाए गए कीटनाशक रहित खेती के इस अभियान को शिखर पर पहुंचाने के लिए निडाना व ललीतखेड़ा की महिलाएं जी-जान से जुटी हुई हैं। इस अभियान की जड़ें गहरी करने तथा अधिक से अधिक गांवों तक इस मुहिम को पहुंचाने के लिए इन महिला किसानों द्वारा अन्य महिलाओं को भी मास्टर ट्रेनर ते तौर पर ट्रेंड किया जा रहा है। इन महिलाओं द्वारा ललीतखेड़ा गांव के खेतों में चल रही महिला किसान पाठशाला में आने वाली अन्य महिलाओं को कीटों की पहचान करवाकर इनके क्रियाकलापों की भी जानकारी दी जाती है। बुधवार को भारी बारिश के दौरान भी ये महिलाएं खेत पाठशाला में पहुंची और हाथों में छाता लेकर खेत में कीट सर्वेक्षण भी किया। महिलाओं ने पांच-पांच के 6 ग्रुप बनाए और प्रत्येक ग्रुप ने पांच-पांच पौधों से 9-9 पत्तों पर मौजूद कीटों की गिनती की। कीट सर्वेक्षण के बाद महिलाओं ने चार्ट पर अपनी सर्वेक्षण रिपोर्ट पेश की। महिलाओं द्वारा पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार पूनम मलिक के कपास के इस खेत में प्रत्येक पत्ते पर सफेद मक्खी की संख्या 0.4 प्रतिशत, तेले के शिशुओं की संख्या 0.6 प्रतिशत तथा चूरड़े की संख्या 1.3 प्रतिशत थी। वैज्ञानिक मापदंड के अनुसार खेत में मौजूद इन कीटों की संख्या आर्थिक हानि पहुंचाने से काफी नीचे थी। इसलिए महिलाओं को इस खेत में कीटनाशक के प्रयोग की कोई गुंजाइश नजर नहीं आई। पाठशाला के दौरान महिलाओं ने दो नई किस्म के हथजोड़े देखे। महिलाओं ने बताया कि अब तक वे 9 किस्म के हथजोड़े देख चुकी हैं। कीट सर्वेक्षण के दौरान शीला मलिक ने सभी महिलाओं का ध्यान अपने ऊपर मंडरा रही लोपा मक्खियों के झुंड की तरफ खींचा। लोपा मक्खियों के झुंड को देखकर अंग्रेजो ने कहा कि जब ये मक्खी काफी नीचे को उड़ती हैं तो भारी बारिश आने की संभावना रहती है। इसी दौरान राजवंती ने बताया कि हरियाणा के लोग इसे हैलीकॉप्टर (जहाज) के नाम से जानते हैं। लेकिन अंग्रेज इसे ड्रेगनफ्लाई कहते हैं। राजवंती की बात को बीच में काटते हुए संतोष ने कहा कि यह मक्खी पीछवाड़े से सांस लेती है। सरिता ने महिलाओं को चुप करते हुए कहा कि इसकी पहचान के साथ-साथ इसके काम पर ध्यान देने की जरुरत है। सरिता ने महिलाओं को समझाते हुए कहा कि यह मक्खी हमारे सिर पर इसलिए उड़ रही है कि जब हम खेत में से चलते हैं तो पौधों पर बैठे कीट व पतंगे उड़ते हैं और यह उड़ते हुए कीटों का शिकार कर अपना पेट भरती है। सरिता ने कहा कि यह मक्खी धान के खेत में खड़े पानी में अपने अंडे देती है। अगर किसान धान में कीटनाशक का प्रयोग न करें तो धान में आने वाली तन्ना छेदक व पत्ता लपेट को यह बड़ी आसानी से कंट्रोल कर लेती है। सरिता ने बताया कि हरियाणा का कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसने इसे देखा न हो, लेकिन उन्हें इसकी पहचान नहीं है। सरिता ने कहा कि उसने स्वयं लोपा मक्खी की चार प्रजातियों को देख चुकी है। इसी दौरान कपास के फूल पर पुष्पाहारी कीट तेलन को देखकर प्रेम ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। प्रेम ने कहा कि निडाना व ललीतखेड़ा में इस मक्खी का प्रकोप ज्यादा है, क्योंकि यहां के किसान कीटनाशकों का प्रयोग नहीं करते हैं। रणबीर मलिक ने प्रेम के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि तेलन तो उनकी फसल की हीरोइन है, क्योंकि यह कपास में परपरागन में अहम भूमिका निभाती है। मलिक ने बताया कि निडाना के किसानों ने अब तक तेलन द्वारा प्रकोपित 508 फूलों की फूलों की पहचान की है। इनमें से सिर्फ तीन फूल ही ऐसे थे, जिनके मादा भाग खाए गए थे। बाकि 505 फूलों के सिर्फ नर पुंकेशर व पंखुड़ियां खाई हुई थी तथा मादा भाग सुरक्षित था। मलिक ने बताया कि यह अपने अंडे जमीन में देती है और इसके बच्चे मासाहारी होते हैं, जो टिड्डो व अंडों को अपना शिकार बनाते हैं। रमेश मलिक ने महिलाओं को मटकू बुगड़े व लाल बणिये के अंडे दिखाए।
बारिश के दौरान छाता लेकर कीटों का निरीक्षण करती महिलाएं।

कपास के पत्ते पर मौजूद लोपा मक्खी (ड्रेगनफ्लाइ)।

तेलन कीट द्वारा कपास के फूल के नर पुंकेशर खाने के बाद सुरक्षित मादा पुंकेशर।

Wednesday, August 15, 2012

स्वतंत्रता दिवस पर महिलाओं ने लिया देश को जहर से आजाद करवाने का संकल्प

कपास के पौधे पर कीटों की गिनती करती महिलाएं।

 कपास के फूल को खाती तेलन
        एक तरफ 15 अगस्त को जहां सारे देश में 66 वें स्वतंत्रता दिवस की खुशियां मनाई जा रही थी। जगह-जगह कार्यक्रमों का आयोजन कर देशभक्ति से ओत-प्रोत भाषणों से युवा पीढ़ी में देशभक्ति का बीज बो कर उन्हें देश सेवा की शपथ दिलवाई जा रही थी, वहीं दूसरी तरफ जिले के ललीतखेड़ा गांव के खेतों में महिला किसान पाठशाला की महिलाएं देश को जहर से मुक्त करवाने का संकल्प ले रही थी। अपने इस संकल्प को पूरा करने के लिए महिलाएं हाथ में कागज-पैन उठाकर भादो की इस गर्मी में कीट सर्वेक्षण के लिए कपास के पौधों से लटापीन होती नजर आई। इस दौरान महिलाओं को प्रेरित करते हुए सर्व खाप पंचायत के संयोजक कुलदीप ढांडा ने कहा कि 15 अगस्त 1947 को हमें राजनीतिक आजादी तो मिली और इससे हमें विकास के लाभ भी हासिल हुए, लेकिन कीटनाशकों से मुक्ति की लड़ाई अभी जारी है। निडाना व ललीतखेड़ा की महिलाओं ने हिंदूस्तान की जनता को जो रास्ता दिखाया है, इससे एक दिन यह लड़ाई जरुर सफल होगी और जनता को विषमुक्त भेजन भी मिलेगा। जिससे हमारा पर्यावरण भी सुरक्षित बनेगा। इस अवसर पर महिलाओं ने 6 समूह बनाकर कपास के खेत का सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षेण के दौरान महिलाओं ने पांच-पांच पौधों के पत्तों पर कीटों की गिनती की। महिलाओं ने पौधे के ऊपरी, बीच व निचले हिस्से से तीन-तीन पत्तों का सर्वेक्षण कर फसल में मौजूद सफेद मक्खी, चूरड़ा व तेले की तादात अपने रिकार्ड में दर्ज की। इसके बाद महिलाओं ने फसल में मौजूद कीटों का बही-खाता तैयार किया। बही-खाते में महिलाओं ने अपने-अपने खेत से लाए गए आंकड़े भी दर्ज करवाए। महिलाओं ने अपने खेत से दस-दस पौधों से आंकड़ा तैयार किया था, लेकिन सुषमा पूरे 28 पौधों से आंकड़ा तैयार कर लाई थी। खुशी की बात यह थी कि इन महिलाओं ने अभी तक अपने खेत में एक छटाक भी  कीटनाशक का प्रयोग नहीं किया है। पाठशाला के दौरान महिलाओं ने कपास के फूलों पर तेलन का हमला देखा। महिलाओं ने पाया कि तेलन द्वारा सिर्फ फूल की पुंखडि़यां व नर पुंकेशर खाए हुए थे, जबकि स्त्री पुंकेशर सुरक्षित था। तेलन द्वारा खाए गए फूलों से फसल के उत्पादन पर कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं इसे परखने के लिए महिलाओं ने इन फूलों को धागे बांधकर इनकी पहचान की। ताकि इससे यह पता चल सके की इन फूलों से फल बनता है या नहीं। ललीतखेड़ा में चल रही इस महिला पाठशाला में ललीतखेड़ा गांव से नरेश, शीला, संतोष, कविता, राजबाला, निडानी से संतोष व कृष्णा पूनिया, निडाना से कृष्णा, बीरमती, सुमित्रा, कमलेश, केलो तथा निडाना की मास्टर ट्रेनर मीनी, अंग्रेजो, बिमला, कमलेश व राजवंती मौजूद थी।

Wednesday, August 8, 2012

बुंदाबांदी के मौसम में भी महिलाओं ने किया कीट अवलोकन व निरीक्षण

 ललीतखेड़ा गांव की किसान पूनम मलिक के खेत में चल रही महिला किसान पाठशाला में बुधवार को महिलाओं ने बुंदाबांदी के मौसम में भी कीट अवलोकन एवं निरीक्षण किया। कीट निरीक्षण के दौरान पाया गया कि अभी तक कपास की फसल में मौजूद रस चूसक कीट सफेद मक्खी, हरा तेला व चूरड़ा फसल में आर्थिक कागार को पार नहीं कर पाए हैं। प्रेम मलिक ने पाठशाला में मौजूद महिला किसानों के समक्ष कपास के खेत में मौजूद तेलन के प्रति अपनी आशंका जताते हुए पूछा की तेलन कपास की फसल में क्या करती है। क्योंकि प्रेम मलिक पिछले सप्ताह अपनी कपास की फसल में तेलन नामक कीट के क्रियाकलापों को देखकर चिंतित थी। प्रेम मलिक ने महिलाओं को तेलन के क्रियाकलापों का जिकर करते हुए बताया कि तेलन कपास के पौधों पर बैठकर कपास के फूलों को खा रही थी। जिससे कारण उसे फसल के उत्पादन की चिंता सता रही है। महिलाओं ने प्रेम मलिक की समस्या का समाधान करने के लिए फसल में मौजूद तेलन के क्रियाकलापों को बड़े ध्यान से देखा। महिलाओं ने पाया कि तेलन द्वारा अधिकतर कपास के फूलों की पुंखडि़यों व फूल के नर पुंकेशर ही खाए हुए थे, जबकि स्त्री पुंकेशर सुरक्षित था। महिलाओं ने महिला किसान की समस्या का समधान धान करते हुए कहा कि जब तक फूल में स्त्री पुंकेशर सुरक्षित है तब तक फसल के उत्पादन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। बल्कि तेलन इस प्रक्रिया में परागन करवाने की भूमिका भी निभाएगी। मीना मलिक ने बताया कि तेलन अपने अंडे जमीन में देती है और इसके अंडों में से निकलने वाले बच्चे दूसरे कीटों के अंडों व बच्चों को खाकर अपना गुजारा करते हैं। इनमें खासकर टिडे के बच्चे शामिल हैं। इसलिए जिस वर्ष कपास में तेलन की संख्या ज्यादा होगी उस वर्ष टिडे कम मिलेंगे। रणबीर मलिक ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि यह तेलन पिछले वर्ष उसकी देसी कपास में भी आई थी। जिसे देखकर उसके माथे पर भी चिंता की लकीरे पैदा हो गई थी, लेकिन यह जल्द ही कपास के फूलों को छोड़कर जंतर (ढैंचा) के फूलों पर चली गई थी। लेकिन इसमें ताज्जुब की बात यह है थी कि तेलन द्वारा जंतर पर चले जाने के बाद भी जंतर की एक भी फली खराब नहीं हुई। सुषमा मलिक ने बताया कि कपास की फसल का जीवन चक्र 170 से 180 दिन का होता है और अब फिलहाल कपास की फसल 100 दिन के लगभग हो चुकी है। लेकिन अब तक पाठशाला में आने वाली किसी भी महिला को अपनी फसल में एक छटांक भी कीटनाशक के प्रयोग की जरुरत नहीं पड़ी है। इसलिए तो कहते हैं कीट नियंत्रणाय कीट हि: अस्त्रामोघा। अर्थात कीट नियंत्रण में कीट ही अचूक अस्त्र हैं।
कपास के फूलों की पुंखडि़यों को खाती तेलन 
 कपास की फसल का निरीक्षण करती महिला किसान।
खेत में कीटों का अवलोकन करती महिलाएं 

Saturday, August 4, 2012

सत्यमेव जयते के पर्दे पर दिखेंगी कीटों की मास्टरनी

  निडाना व ललीतखेड़ा की महिलाएं अब सत्यमेव जयते के पर्दे पर नजर आएंगी। कीटों की इन मास्टरिनयों से रू-ब-रू होने के लिए शनिवार को दिल्ली से सत्यमेव जयते की टीम ललीतखेड़ा गांव के खेतों में चल रही महिला किसान पाठशाला पहुंची। इस दौरान टीम ने लगभग आधे घंटे तक ललीतखेड़ा व निडानी की महिलाओं से कीटनाशक रहित खेती पर सवाल-जवाब किए व उनके अनुभव को अपने कैमरे में कैद किया। दरअसल सत्यमेव जयते की ये टीम अपने 'असर' कार्यक्रम की शूटिंग के लिए यहाँ आई थी और इसी  कार्यक्रम के लिए महिलाओं के शाट लिए।
निडाना व ललीतखेड़ा की महिलाएं अब सत्यमेव जयते के पर्दे से दुनिया के सामने खेतों से पैदा किए गए अपने कीट ज्ञान को बांटेगी। इसकी कवरेज के लिए सत्यमेव जयते की एक टीम शनिवार को ललीतखेड़ा गांव में चल रही महिला किसान पाठशाला में पहुंची। टीम की रिपोर्टर रितू भारद्वाज ने लगातार आधे घंटे तक इन महिलाओं के बीच बैठकर कीटनाशक रहित खेती के इनके ज्ञान को परखा तथा कैमरामैन कपील सिंह ने इनके अनुभव को अपने कैमरे में कैद किया। टीम ने महिलाओं से बिना कीटनाशक के फसल से अधिक पैदावार लेने का फार्मूले पर काफी देर तक चर्चा की। महिलाओं ने भी बिना किसी झिझक के खुलकर टीम के सामने अपने विचार रखे। कीटों की मास्टर ट्रेनर सविता, मनीषा, मीना मलिक ने बताया कि उन्होंने 142 प्रकार के कीटों की पहचान कर ली है। जिसमें 43 किस्म के कीट शाकाहारी व 99 किस्म के कीट मासाहारी होते हैं। शाकाहारी कीट फसल में रस चूसकर व पत्ते खाकर अपनी वंशवृद्धि करते हैं, लेकिन मासाहारी कीट शाकाहारी कीटों को खाकर अपना गुजारा करते हैं। इस प्रकार मासहारी कीट शाकाहारी कीटों को चट कर देते हैं। कीटों के जीवनचक्र के दौरान किसान को कीटनाशक का प्रयोग करने की जरुरत नहीं पड़ती। आज किसान को अगर जरुरत है तो वह है कीटों का ज्ञान अर्जित करने की। कीट मित्र किसान रणबीर मलिक ने टीम द्वारा पुछे गए बिना कीटनाशक का प्रयोग किए अच्छी पैदावार लेने के सवाल का जवाब देते हुए मलिक ने बताया कि अच्छी पैदावार के लिए दो चीजों की जरुरत होती है। पहली तो सिंचाई के लिए अच्छे पानी व दूसरी खेत में पौधों की पर्याप्त संख्या। खेत में अगर पौधों की पर्याप्त संख्या होगी तो अधिक पैदावार अपने आप ही मिल जाएगी। किसान रामदेवा ने टीम के सामने कीटनाशक का प्रयोग न करने वाले एक किसान का ताजा उदहाराण रखते हुए बताया कि उनके पड़ोसी किसान कृष्ण की गन्ने की फसल में काली कीड़ी का काफी ज्यादा प्रकोप हो गया था, लेकिन कृष्ण ने एक बार भी अपनी फसल में कीटनाशक का प्रयोग नहीं किया। कुछ दिन बाद काली कीड़ी को मासाहारी कीटों ने चट कर उसका खात्मा कर दिया और आज कृष्ण की गन्ने की फसल सुरक्षित है। इस प्रकार किसान का कीटनाशक पर खर्च होने वाला पैसा भी बच गया और उसकी फसल जहर से भी बच गई। इस दौरान टीम ने महिलाओं द्वारा कीटों पर लिखे गए गीतों की रिकार्डिंग भी की। बाद में महिलाओं ने टीम को हथजोड़ा कीट का चित्र स्मृति चिह्न के रूप में भेंट किया।
महिलाओं की कायल हो गई टीम की रिपोर्टर: टीम की रिपोर्टर रितू भारद्वाज कार्यक्रम की रिकार्रिंड़ग के दौरान महिलाओं से सवाल-जवाब करते समय उनके अनुभव को देखकर उनकी कायल हो गई। रितू ने इन महिलाओं से प्रेरणा लेकर इस अभियान की जमीनी हकीकत से रू-ब-रू होने के लिए महिलाओं से दौबारा अपने पिता के साथ उनकी पाठशाला में आने का वायदा किया।

पाठशाला में महिलाओं को कैमरे में शूट करते टीम के सदस्य।
 टीम की रिपोर्टर को स्मृति चिह् भेंट करती महिलाएं।



Wednesday, August 1, 2012

कीटों की ‘कलाइयों’ पर भी सजा बहनों का प्यार

भाई व बहन के प्यार के प्रतीक रक्षाबंधन के त्योहार पर आप ने बहनों को भाइयों की कलाइओं पर राखी बांधते हुए तो खूब देखा होगा, लेकिन कभी देखा या सुना है कि किसी लड़की या किसी महिला ने कीट को राखी बांधकर अपना भाई माना हो और कीट ने उसे राखी के बदले कोई शुगुन दिया हो नहीं ना। लेकिन निडाना व ललीतखेड़ा गांव की महिलाओं ने रक्षाबंधन के अवसर पर कीटों की कलाइयों पर बहन का प्यार सजाकर यानि राखी बांधकर ऐसी ही एक नई रीति की शुरूआत की है। महिलाओं ने कीटों के चित्रों पर प्रतिकात्मक राखी बांध कर इन्हें अपने परिवार में शामिल कर इनको बचाने का संकल्प लिया है। कीट मित्र महिला किसानों ने बुधवार को ललीतखेड़ा गांव में पूनम मलिक के खेतों पर आयोजित महिला किसान पाठशाला में रक्षाबंधन के अवसर पर मासाहारी कीटों के चित्रों पर राखी बांध कर कीटों को भाई के रूप में अपना लिया। इसके साथ ही इन अनबोल मासाहारी कीटों ने भी इन महिला किसानों को शुगुन के रूप में उनकी थाली से जहर कम करने का आश्वासन दिया। रक्षाबंधन के आयोजन से पहले महिला किसान पाठशाला की रूटिन की कार्रवाई चली। महिला किसानों ने कपास की फसल का अवलोकन कर कीट बही-खाता तैयार किया।
निडाना व ललीतखेड़ा की महिला किसान पाठशाला की महिलाओं ने भाई-बहन के प्यार के प्रतिक रक्षाबंधन के पर्व पर कीटों को राखी बांधकर नई परंपरा की शुरूआत की है। इन महिला किसानों द्वारा शुरू की गई इस नई परंपरा से जहां कीटों को तो पहचान मिलेगी ही, साथ-साथ हमारे पर्यावरण पर भी इसके सकारात्मक प्रभाव पड़ेंगे। कीट मित्र महिला किसानों ने बुधवार को महिला किसान पाठशाला में मासहारी कीट हथजोड़े को राखी बांधकर सभी मासाहारी कीटों को अपना भाई स्वीकार कर उन्हें अपने परिवार का अंग बना लिया। महिलाओं ने राखी बांधकर यह संकल्प लिया कि वे फसल में मौजूद कीटों की सुरक्षा के लिए अपनी फसल में किसी भी प्रकार के कीटनाशक का प्रयोग नहीं करेंगी। इसके साथ-साथ महिलाओं ने ‘हो कीड़े भाई म्हारे राखी के बंधन को निभाना’ गीत गाकर कीटों से राखी के शुगुन के तौर पर उनकी फसल की सुरक्षा करने की विनित की। महिलाओं ने रक्षाबंधन की पूरी परंपरा निभाई तथा कीटों के चित्रों को राखी बांधने के बाद उनकी आरती भी उतारी। इसके अलावा महिलाओं ने ‘ऐ बिटल म्हारी मदद करो हामनै तेरा एक सहारा है, जमीदार का खेत खालिया तनै आकै बचाना है’, ‘निडाना-खेड़ा की लुगाइयां नै बढ़ीया स्कीम बनाई है, हमनै खेतां में लुगाइयां की क्लाश लगाई है’, ‘अपने वजन तै फालतु मास खावै वा लोपा माखी आई है’ आदि भावुक गीत गाकर किसानों को झकझोर कर रख दिया। अंग्रेजो, गीता मलिक, बिमला मलिक, कमलेश, राजवंती, मीना मलिक ने बताया कि किसान जानकारी के अभाव में अपनी फसल के रक्षकों के ही भक्षक बन जाते हैं। उन्होंने बताया कि फसल में दो प्रकार के कीट होते हैं एक शाकाहारी व दूसरे मासाहारी। मासाहारी मास खाकर अपनी वंशवृद्धि करते हैं। शाकाहारी फसल के फूल, पत्ते खाकर व इनका रस चूसकर अपना जीवनचक्र चलाते हैं। खान-पान के अधार पर शाकाहारी कीट भी दो प्रकार के होते हैं। एक डंक वाले व दूसरे चबाकर खाने वाले। पाठशाला की शुरूआत के साथ ही महिलाओं ने अपने रूटिन के कार्य पूरे किए। महिलाओं ने फसल का अवलोकन कर कीट बही-खाता तैयार किया। बही-खाते में दर्ज रिपोर्ट के आधार पर फसल में अभी तक किसी भी प्रकार के कीटनाशक की जरुरत नहीं थी। इस अवसर पर पाठशाला के संचालक डा. सुरेंद्र दलाल के साथ खाप पंचायतों के संयोजक कुलदीप ढांडा, कीट कमांडो किसान रणबीर मलिक, मनबीर रेढू, रमेश सहित अन्य किसान भी मौजूद थे।  

140 पर पहुंची कीटों की गिनती

 कीटों को राखी बांधने से पहले थाली सजाती महिलाएं।

 कीटों को राखी बांधने से पहले थाली सजाती महिलाएं।

हथजोड़ा नामक कीट के चित्र की आरती उतारती महिलाएं।

हथजोड़ा नामक कीट के चित्र पर तिलक करती महिलाएं

बहना की कलाई पर राखी बंधवाने पहुँचा - मटकू बुग्ड़ा

Saturday, July 23, 2011

छात्र कीट पाठशाला का पहला सत्र !

जुलाई महीने की तेईस तारीख सुबह के आठ ही बजे हैं कि महिला खेत पाठशाला की मीना मलिक, बिमला, गीता, सरोज, राजवंती, कमलेश व् अंग्रेजों रणबीर मालिक के साथ मास्टर ट्रेनर की अपनी ऐतिहासिक  जिम्मेवारी निभाने कपास के खेत में पहुँच चुक्की हैं. अन्य महिलाओं की तरह इन्हें भी सुबह चार बजे उठकर न्यार-फूस, धार-डौकी, दूध बिलौना, गोबर-पानी व् बच्चों के लिए भोजन पकाने आदि अनेक कार्य करने होते हैं. इतने सारे काम निपटा कर इस जहर मुक्ति के काम को आगे बढ़ाने के लिए स्कूली बच्चों को कीट ज्ञान प्रदान करने लिए यहाँ पहुंचना ऐतिहासिक  नही तो और क्या है?
ठीक साढ़े आठ बजे डेफोडिल पब्लिक स्कूल, निडाना के 35 छात्र एवं छात्रा भी अपनी अध्यापिकाओं श्रीमती कांता व् सीमा मलिक के नेतृत्व में कपास के इस खेत में पीपल के नीचे पहुँच जाते हैं. ठीक इनके पीछे-पीछे इसी स्कूल के सह-संचालक श्री विजेंद्र मलिक व् प्राचार्य श्री ज्ञानी राम भी यहाँ पहुँच जाते हैं.
श्री रणबीर सिंह मलिक ने इस कीट पाठशाला के आयोजन व् उद्देश्यों के बारे में बच्चों को विस्तार से बताया. मीणा मलिक ने पाठशाला के लिए बच्चों का पंजीकरण किया. पांच-पांच बच्चों के सात समूह बनाये गये जो निम्नांकित थे.

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बच्चों के सात ग्रुप और इतने ही मास्टर ट्रेनर व् तीन स्कुल के अध्यापक. सभी ने कपास के खेत में ग्रुपों में जाकर ध्यानपूर्वक पौधों एवं कीटों का अवलोकन व् निरिक्षण किया. सभी सात के सात ग्रुपों ने दस-दस पौधों के तीन-तीन पत्तों पर क्रमवार सफ़ेद-मक्खी, तेला व् चुरड़े के केवल निम्फों की गिनती की व् अपनी-अपनी कापी में नोट किया. इसके साथ-साथ प्रत्येक पौधे पर दुसरे सभी कीटों की गिनती की व् इसे भी कापी में नोट किया. "ये क्या? देखो मैम", रेनू अचानक चिल्लाई.
'कुछ नही, ग्रास होपर है." विज्ञानं अध्यापिका विवेक ने तपाक से जबाब दिया.
इतना सुनते ही बिमला मुस्करा कर बोली, "ना मैडम ना, यू तो हथजोड़ा सै- गीदड़ की सुंडी आला. हमने तो इस पर एक गीत घड़ राख्या सै. मांसाहारी कीड़ा सै. अपनी कपास की फसल में बहुत सारे कीड़ों को खा-पीकर ख़त्म करेगा. अंग्रेजी में इस नै के कहा करै- वो डाक्टर जी तै पूछ लो. मनै तो स्कूल की पछीत भी नही देख राखी."
       राहुल वाले ग्रुप के उत्प्रेरक रनबीर मलिक के काना में जब ये बात पड़ी तो कहन लगा कि अंग्रेजी में तो इसनै प्रेयिंग मेंटिस कहा करै. मेरी दादी इस कीड़े की अंडेदानी को चीथड़े में बाँध कर ताक में रखती थी. वो इस अंडेदानी का के करा करै थी- इसका मनै भी नही बेरया. किसानों द्वारा धीरे से कीड़ों के ज्ञान को बच्चों की तरफ सरकाने के इस लाजवाब तरीके पर डॉ.दलाल भी हैरान था.
इसके बाद सभी ग्रुपों ने खेत के एक कोने में खड़े पीपल की छाँव में बैठकर अपनी इस कारवाई को चार्टों पर उतारा व् बारी-बारी से ग्रुप लीडरों ने चार्टों की मदद से सबके सामने पेश किया. 
                       सात के सात ग्रुपों द्वारा रिपोर्ट किये गये कीड़ो की संख्या को जोड़ा गया व् प्रति पत्ता औसत निकाली गयी. हरे तेले की 1.3, सफ़ेद माखी की 1.9 व् चुरड़े की 2.7 पाई गयी. यह औसत सत्तर पौधों के तीन-तीन पत्तों पर आधारित थी. सैम्पल साईज के कारण इस पर भरोसा ना करने का भी कोंई कारण नही था. कीड़ों की यह औसत संख्या उनके हानि पहूचाने के स्तर से काफी नीचे थी.
आज बच्चों ने इस खेत में भान्त-भान्त की वो मकड़ियाँ भी देखी जो घरों में दिखाई नही देती. एक छोटी सी मकड़ी को तेले का चूरमा बनाते हुए भी बच्चों ने देखा. भावना ने चुटकी ली," सर, मकड़ी के शारीर के तो दो ही भाग है. फिर इसे कीड़ों की श्रेणी में कैसे रखेंगे?"
   इतनी सुनकर कमलेश ने आगे बात बढ़ाई अक इसकी चार जोड़ी टांग से जबकि कीड़ों की तीन जोड़ी. इन मकड़ियां नै आपां जनौर कह कर गुज़ारा कर लेवां, इसमें ही सब कुछ आ जा सै. हाँ, इतना जरुर याद रख ले अक ये सारी मकड़ी अपने खेतों में कीटों को खा-पीकर जिन्दा रहती है. दस तरह की तो मैने ही अपने खेत में देख ली. अचूक किस्म की पेस्टीसाईड(कीड़ेमार) सै - ये मकड़ियां.
" दो ही घंटे के लिए हैं, हमारे छात्र आपके पास", ज्ञानी राम ने वायदा याद दिलाया. बस सब कुछ बीच में छोड़कर, फटाफट बिमला द्वारा लाया गया बाकुलियों के रूप में कीट-प्रसादा सभी को बांटा गया. बिमला द्वारा तैयार इस कीट-प्रसादे में कंडेसर का नमक अर तीखी मिर्च भुलाये नही भूलेंगी, हम्में.

Saturday, July 16, 2011

महिला खेत पाठशाला की दुसरे साल में नई शुरुवात !

  आज 16 जुलाई,2011 को  निडाना गाम की महिला खेत पाठशाला की दुसरे साल में एक नई शुरुवात के बीज बोए गये. रा.व्.मा. विद्यालय, डिफेंस कालोनी, जींद की विज्ञानं अध्यापिका श्रीमती सुशीला अपनी छात्राओं ममता, पिंकी व् प्रियंका के साथ कृषि विकास अधिकारी, निडाना के कार्यालय पहुंची. इन्होने कृषि विकास अधिकारी को बताया कि वे अपने भोजन में लगातार बढती जहर की मात्रा को लेकर बहुत चिंतित हैं तथा साथ में ही भुगतभोगी भी. वे समझती हैं कि मानव के लिए यह आत्मघाती परिस्थिति फसलों में कीट नियंत्रण के लिए कीटनाशकों के अनावश्यक एवं अंधाधुंध प्रयोग के कारण ही पैदा हुई हैं. कीटनाशकों के अनावश्यक एवं अंधाधुंध प्रयोग की बात छोड़िये अब तो सुना है कि कपास की फसल के लिए ऐसे बीजों का प्रचलन भी हमारे यहाँ आम हो चला है जिनके जरे-जरे में जहर होता है. आप इन्हें बी.टी.काटन कहते हैं. इसी लिए अपने पर्यावरण व् भोजन सुरक्षा के वास्ते हमने एक लघु परियोजना के तहत बी.टी.काटन के खेत में कीड़ों की वस्तुस्तिथि जानने के लिए अध्यन की ठानी है जबकि दूसरी परियोजना
कांग्रेस घास पर कीड़ों की जानकारी लेने के बारे में है.
  निडाना के कृषि विकास अधिकारी डा.सुरेन्द्र दलाल ने तुरंत इस टीम की मुलाक़ात महिला खेत पाठशाला की एक होनहार सदस्य श्रीमती अनीता मलिक से करवाई. अनीता ने अपने इन मेहमानों के लिए फ़टाफ़ट जलपान का जुगाड़ किया व् इसी दौरान अपने  पति श्री रणबीर सिंह तथा   अपनी जेठानी श्रीमती बिमला मलिक से बातचीत की. इस टीम के आने का प्रयोजन बताया. आगुन्तक टीम अनीता, बिमला व् रणबीर सिंह के साथ गोहाना रोड पर इनके कपास के खेत में पहुंचे और कीड़ों का अवलोकन व् निरिक्षण शुरू किया. अपने पड़ौस में
अन्य स्कूल के छात्रों की इस अप्रत्यासित कारवाई को देख कर डेफोडिल पब्लिक स्कूल, निडाना के सहसंचालक श्री विजेंद्र मलिक व् प्राचार्य श्री ज्ञानी राम शर्मा भी खेत में आ पहुंचे. इस कार्यवाही की पूरी जानकारी जुटाई. इन्होने इस टीम को काम निपटाने के बाद स्कूल में जलपान का निमंत्रण दिया. साढ़े तीन घंटे बी.टी.काटन के खेत में कीड़ों का अध्यन कर यह छात्रों एवं किसानों की टीम डेफोडिल पब्लिक स्कूल के कार्यालय में जलपान के लिए पहुंची. जलपान के दौरान ही स्कूल के सहसंचालक श्री विजेंद्र मलिक ने टीम के सामने उनके छात्रों के लिए भी प्रत्येक शनिवार को सुबह आठ से दस बजे तक इस कीट पाठशाला के आयोजन का प्रस्ताव पेश किया. निडाना गावं के इन तीन किसानों ने प्रस्ताव के माध्यम से
आई इस रोमांचकारी चुनौती को सह हर्ष स्वीकार किया. गावं में पहुँचते ही इन्होने अंग्रेजो की मदद से चार बजे महिला खेत पाठशाला की सभी सदस्यों की मीटिंग बुलाई. इस बैठक में डेफोडिल पब्लिक स्कूल, निडाना के छात्रों के लिए कीट पाठशाला के संचालन की बातचीत रखी और इसके लिए मास्टर ट्रेनरों के रूप में काम करने के लिए महिला किसानों से नाम मांगे गए. मीना मलिक, सरोज, कमलेश, बिमला, गीता, अंग्रेजो व् राजवंती ने इस काम के लिए अपने नाम लिखवाए और अगले शनिवार को 23 जुलाई की सुबह साढ़े आठ बजे प्रयोगाधीन खेत में पहुँचने का वायदा किया.


Friday, December 24, 2010

किसान खेत दिवस

24 दिसम्बर 10 को निडाना में कृषि विभाग के सौजन्य से किसान खेत दिवस का आयोजन किया गया. यह आयोजन निडाना गावँ में लगाई गयी महिला खेत पाठशाला के परिणाम किसानो को बताने के लिए किया गया. इस प्रोग्राम के मुख्य अतिथि कृषि विभाग के सयुंक्त निदेशक व हमेटी, जींद के प्राचार्य कम निदेशक डा.भूल सिंह नैन थे. जबकि इसकी अध्यक्षता जिला जींद के कृषि उपनिदेशक डा. आत्मा राम गोदारा ने की. इस कार्यक्रम में जिला जींद के दो दर्जन गावों से 1700 के लगभग किसानों ने भाग लिया. इनमे से 250 के आसपास महिला किसान थी. कृषि विभाग की विभिन्न शाखाओं द्वारा प्रदर्शनी लगाई गयी.किसान खेत दिवस के इस अवसर पर  गावँ के वर्तमान सरपंच श्री सुरेश मलिक के साथ-साथ पांच भूत पूर्व सरपंच सर्वश्री दलीप सिंह, रत्तन सिंह, बसाऊ राम, रणबीर सिंह व रामभगत सेठ भी इस मौके पर उपस्थित थे. इन्होने कार्यक्रम की औपचारिक शुरुवात होने से पहले ही  जिला जींद के जमीनी हकीकत से जुड़े मिडियाकर्मियों को निडाना के किसानों की तरफ से शाल उढ़ाकर सम्मानित किया व समृति चिन्ह भेंट किये. ये सम्मानित पत्रकार दैनिक भास्कर से श्री सुशिल भार्गव, हरी भूमि से श्री विजेंद्र कादयान, अमर उजाला से श्री सतेन्द्र पंडित, आज आवाज से श्री धर्मबीर निडाना, थे.  इण्डिया न्यूज़, हरियाणा से श्री सुनील मोंगा व उनके कैमरामैन रोहताश भोला तीन दिन पहले एक दुर्घटना में सुनील मोंगा के घायल होने के कारण इस अवसर पर पहुँच नही पाए. उनकी जगह जे.सी.एन.(शहरनामा) के श्री ऋषि ने ये स्मृति चिन्ह ग्रहण किये. हिंदुस्तान टाईम्स से सुश्री निशा अवतार व दी ट्रिब्यून से बिजेंद्र अहलावत किन्ही कारणों से इस प्रोग्राम में पहुँच नही सके. 
ठीक साढ़े ग्यारह बजे  हमेटी के निदेशक डा.भूल सिंह नैन ने रीबन काट कर कृषि विभाग द्वारा आयोजित इस प्रोग्राम की विधिवत शुरुवात की.  इसके बाद डा. नैन ने कृषि विभाग के प्रदर्शनी स्थलों का जायजा लिया. इसके बाद उन्होंने निडाना के किसानों द्वारा लगाये गई कीट प्रदर्शनी का बारीकी से अवलोकन किया व निडाना के खेतों में कपास की फसल में पाए गये कीटों के बारे में विस्तार से जानकारी ली व कीट-प्रासादा चखा. याद रहे निडाना के किसानों ने सभीं आगुन्तकों के लिए प्रसादे के रूप में चालीस किलो देसी घी से तैयार हलवे व बाकुली का प्रबंध कर रखा था. कीट प्रसाद घर में कीट-प्रासादा ग्रहण करने वालों को एक-एक कैलेंडर भी भेंट किया जा रहा था.  कीटों की पहचान  के महत्व पर तैयार यह कैलेंडर गावँ के नम्बरदार श्री राममेहर मलिक ने अपने खर्चे से छपवाया व इसकी 1700 प्रतियाँ यहाँ बांटी गयी. इस खेत दिवस में आने वाला हर किसान जितनी बार कीट-प्रासादा चखना चाहे - पूरी छुट थी. पर एक शर्त थी कि उसकों हर बार यहाँ प्रदर्शित कीटों की जानकारी लेनी होगी.
स्टेज पर कार्यक्रम की शुरुवात में जिला जींद के कृषि उपनिदेशक डा.आत्मा राम गोदारा ने डा.भूल सिंह नैन को स्मृति चिन्ह भेंट किया. गावँ के भू.पु.सरपंच श्री दलीप सिंह ने आदरमान के लिए गावँ में सबसे बड़े सम्मान की प्रतिक पगड़ी ग्रामवासियों की तरफ से डा.भूल सिंह को तथा वर्तमान सरपंच श्री सुरेश मलिक ने डा. आत्मा राम गोदारा को पहनाई. इसी अवसर पर सर्व श्री सुरेन्द्र मलिक व् राजेन्द्र सिंह ने इन अधिकारीयों को खेत पाठशाला की तरफ से स्मृति चिन्ह भेंट किये. इसी समय गावं के प्रगतिशील किसान श्री रामेहर मलिक द्वारा छपवाए गये कीट कलेंडर का विमोचन किया गया|  सहायक गन्ना विकास अधिकारी डा.धर्मपाल कटारिया ने जिले में चल रही गतिविधियों के बारे में लोगों को जानकारी दी. इसके बाद  पाठशाला की महिलाओं ने दो गीतों(कीड़याँ का कट रह्या चाला हे... तथा  मै बीटल हूँ...  मै कीटल हूँ... समझो मेरी महता को) की प्रस्तुति दी. इन गीतों के लिए बैन्जू व ढोलक पर श्री कुलदीप सिंह, राजबीर व साथियों ने साथ दिया.इस मौके पर डा.नीना  सुहाग ने भू.संरक्षण से सम्बंधित तकनीकों एवं स्कीमों के जानकारी उपस्थित लोगों को दी. इसी समय डा.राजपाल सूरा ने गेहूं व् सरसों की फसलों की खेती बारे में आधुनिक तकनीकें किसानों को बताई. इसके बाद गावं के भू.पु.सरपंच रत्तन सिंह ने निडाना की धरती पर सभी मेहमानों का स्वागत करते हुए कृषि विभाग द्वारा चलाई जा रही खेत पाठशालाओं के महत्त्व को रेखांकित किया व् किसानों से कीट नियंत्रण के लिए कीटों की पहचान करने की अपील की.. डा.कमल सैनी ने महिला खेत पाठशाला की उपलब्धियों एवं कमजोरियों पर विस्तार से प्रकाश डाला. जिंदल ग्लोबल युनिवर्ष्टि में विधि स्नातक की शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्र श्री अंकित ग्रेवाल ने खुश होकर अपने माँ-बाप की कमाई से 1100 रुपये की राशी महिला खेत पाठशाला की महिलाओं को इनाम स्वरुप भेंट की तथा इन महिलाओं के मुकदमें फ्री में लड़ने का वायदा किया. इसके बाद महिलाओं ने फिर दो गीतों की प्रस्तुति दी. एक गीत था अपने पति को पाठशाला में आकर भान्त-भान्त के कीड़े देखने का आमन्त्रण तथा दुसरे गीत में पाठशाला के विभिन्न सत्रों में पुरषों के उल्हानों का जवाब व् महिलाओं से पाठशाला में शामिल होने की अपील 
इस अवसर पर निडाना गावं के किसान रामेहर मलिक, नम्बरदार ने भी अपने विचार कृषि विभाग के अधिकारीयों व् किसानों से साझा किये| इन्होने उपस्थित किसानों को बताया कि प्रसिध्द कीट विज्ञानी डा.सरोज जयपाल भी इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए करनाल से चल चुकी है और उनके यहाँ तीन बजे तक पहुचने की उम्मीद है|
अब कार्यक्रम के मुख्यातिथि डा.भूल सिंह नैन ने उपस्थित किसानों व् निडाना गावं का विशेष धन्यवाद् करते हुए इस कीट साक्षरता के अभियान में किसानों से और जोर लगाने की अपील की| उन्होंने उम्मीद जताई कि निडाना में शुरू हुआ यह काम जल्दी ही पुरे जींद जिला में फैलेगा और फिर पुरे हरियाणा में अर वो दिन दूर नही जब हम हरियाणा को जहर मुक्त प्रदेश बनाने में कामयाब होंगे| उन्होंने कृषि अधिकारीयों एवं किसानों को कृषि विकास के लिए गाड़ी के दो पहियें बताते हुए इनके आपसी सामंजस्य पर जोर दिया|
अब आज के इस प्रोग्राम क़ी अध्यक्षता कर रहे डा.आत्मा राम गोदारा ने अपना अध्यक्षीय भाषण देते हुए इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, कृषि अधिकारीयों,  आयोजकों व्  विभिन्न गावों से आये हुए किसानों का इस प्रोग्राम के सफल आयोजन के लिए धन्वाद किया और निडाना की महिलाओं का विशेष रूप से| इस समय दिन के दो बजे थे और डा.सरोज जैपाल समय व् स्थान की बाधाओं के चलते तीन बजे से पहले यहाँ पहुच नही सकती|
कार्यक्रम की समाप्ति के बावजूद डा.सुरेन्द्र दलाल ने किसानों से डा. सरोज जयपाल के यहाँ पहुँचने तक यहीं जमे रहने की अपील क़ी| इन्होने किसानों को सुचना दी क़ि डा.साहिबा खांडा-अलेवा पहुच चुकी हैं और अब यहाँ आध-पौन घंटे में पहुच जाएगी. इसी समय डा.आत्मा राम ने कृषि अधिकारीयों को भी मैडम के आने तक यही रुक्कने को कहा|  इंतजार की घड़ियाँ लम्बी होती है और अब इस इंतजार को बौना करने के लिए मोर्चा संभाला मास्टर राजेश व् इसके साथियों ने भूरा और निंघाहिया के किस्से की रागनियाँ गा कर| इंतजार के लम्हे कैसे गुज़रे, किसी को पता ही नही चला|
ठीक तीन बजने में सात मिनट पर डा. सरोज जयपाल यहाँ पहुँचने पर कार्यक्रम में उपस्तिथ 250 से ज्यादा महिलाएं अपनी कुर्सियां छोडकर अपनी चहेती कीट विज्ञानी का स्वागत करने सडक पर आ पहुंची| सबके हाथों में फूल मालाएँ थी|  डा. सरोज जयपाल के गले में फूल माला डालकर महिलाओं द्वारा जाफी भरने में एक गजब का अपनापन था| इसके बाद महिलाओं द्वारा डा. जी को कीट-पंडाल में लेजाकर फलैक्स बोर्डों की मार्फत निडाना में देखे गये सभी मांसाहारी व् शाकाहारी कीट दिखाए गये| तीन कीट रोगाणु व् एनासिय्स, ट्राईकोग्रामा व् टेलेनोम्स जैसे छोटे-छोटे कीड़ों समेत सौ से भी ज्यादा कीड़ों के संजीदा फोटो देखकर डा.सरोज जयपाल हैरान रह गई| कीट-पंडाल के निकासी- द्वार पर महिलाओं द्वारा डा.सरोज व् इनके पति डा, जयपाल ढींढसा को कीट-प्रसादा व् कीट-कलेंडर सप्रेम भेंट किये गये| यहीं जा कर निडाना की इन महिलाओं को डा.सरोज द्वारा अपने नाम के पीछे जयपाल लगाने का भेद मालूम हुआ| इसके पश्चात् इस जोड़े को मंच पर ले जाया गया जहां गावं की महिला किसानों द्वारा डा.सरोज को पगड़ी पहनाई व् शाल भेंट किया गया| इसी समय डा,सरोज व् डा,जयपाल को स्मृति चिन्ह भेंट किया गया| इसके बाद डा,सरोज जयपाल ने समय की नजाकत को देखते हुए कीट प्रबंधन पर सारगर्भित सन्देश यहाँ उपस्तिथ किसानों को दिया| अब जा कर आज का यह खेत दिवस कार्यक्रम सही मायने में समाप्त हुआ| 
अब गावं के किसान डा,सरोज व् डा जयपाल को जलपान के लिए सुरेन्द्र सिंह के घर ले गये| इस अवसर पर सफीदों के उपमंडल कृषि अधिकारी डा.सत्यवान, जींद के उपमंडल कृषि अधिकारीडा.पवन धींगडा, सहायक पौधा संरक्षण अधिकारी डा.मान व् सहायक सांख्की अधिकारी डा.सर्वजीत सिंह भी डा.साहिबा के साथ थे| चाय की चुस्कियों के साथ शुरू हुआ यहाँ के किसानों के साथ अनौपचारिक संवाद का सिलसिला| 
निडाना ग्रामवासियों को सालों-साल यद् रहेगा यह किसान खेत दिवस का कार्यक्रम|



Monday, November 29, 2010

अनावरण-यात्रा

निडाना गावँ में चल रही महिला खेत पाठशाला की  किसानों ने 23 नवम्बर से 28 नवम्बर,2010 तक हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश का पाँच दिवसीय अनावरण-यात्रा की. इस अनावरण-यात्रा का वित्तपोषण आत्मा स्कीम के तहत कृषि विभाग, जींद ने किया. 
                   अनावरण-यात्रा के लिए महिलाओं का यह जत्था  23 नवम्बर की सुबह सात बजे निडाना गावँ से करनाल के लिए रवाना हुआ. गाँव के सरपंच श्री सुरेश मलिक व् महाबीर मलिक ने इस जत्थे को हरी झंडी दिखाकर निडाना गावं से रवाना किया. इस दौरान बस में बैठे-बैठे ही डा सुरेन्द्र दलाल व् डा.कमल सैनी के मार्गदर्शन में इन महिलाओं ने हरियाणा की फसलों में पाए जाने वाले कीटों पर सामूहिक रूप से चार गीतों की रचना की व रास्ते में ही इनकी रिहर्सल की. हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के उचानी स्थित क्षेत्रीय अनुसन्धान केंद्र पहुचने पर कृषि विज्ञानं केंद्र के डा.दिलबाग अहलावत से इस जत्थे की अप्रत्याशित मुलाकात हुई. इस आकस्मिक मुलाकात से डा. साहिब के दिल में उपजी ख़ुशी खून की मार्फ़त उनके चेहरे पर छुपाये नही छुप रही थी. डा. साहिब ही इस जत्थे को डा.सरोज जयपाल की प्रयोगशाला तक लेकर गये. डा. सरोज जयपाल ने भी इस जत्थे को हाथो-हाथ लिया. उन्होंने इन महिलाओं के दो ग्रुप बनवाये.एक ग्रुप को अंदर बुलवाया. डा. साहिब ने इस ग्रुप को गन्ने की फसल में कीट प्रबंधन  बारे विस्तार से जानकारी देनी शुरू की. इस बीच डा. दलाल ने डा. सरोज को बताया की महिलाओं का यह ग्रुप आपके पास कीटों की समस्याओं के समाधान वास्ते नही आया है. बल्कि ये तो आपके पास गन्ने की फसल में हानि पहुचाने वाले कीटों की पहचान करने की गरज से आयी हैं. डा जी, सतयुग में ही एक किसान को समस्याग्रस्त देखकर जब पार्वती ने अपने पतिदेव से इस किसान के दुःख दूर करने की प्रार्थना की तो शिव जी ने पार्वती को ही धमका दिया था "किस किस के दुःख दूर करैगी. या दुनिया दुखी फिरै रानी."  हैसियती  अंहकार से  एकदम कोसों दूर डा. सरोज ने इस बात को बहुत ही सहज भाव से लिया और.कहने लगी आप तो दो कीटों की बात कहते हैं. मैं तुम्में कम से कम 6 कीटों की पहचान करवाउंगी. ठीक इसी समय महिलाओं ने भी लैपटाप पर कपास की फसल में निडाना गावँ में देखे गये सभी कीट डा. सरोज जयपाल को दिखाने शुरू किये तथा रास्ते में रचे गये गीतों में से एक "कीटों का कट रहया चाला हे, मनै तेरी सू" की पहली प्रस्तुति देनी शुरू की. स्लाईड देखते-देखते डा. सरोज ने भी इस गीत को गाने में महिलाओं का पूरा-पूरा साथ दिया. यह नज़ारा देख कर इस खेत पाठशाला के कीट प्रशिक्षक किसान रणबीर मलिक व मनबीर रेड्हू की टिप्पणी थी कि डा. साहब समय के साथ ये गीत हिट हो सकते हैं. इसके पश्चात डा. सरोज जयपाल इन महिलाओं को साथ वाली लैब में ले गयी. वहाँ पर रखे कीटों के संरक्षित सैम्पल एक-एक कर महिलाओं को दिखाने लगी. यह है चोटी-बेदक की सूंडी, यह जड़-बेदक की,.. यह तना-छेदक की,... सभी की विशेषताएं बताई,..  असली बात तो यह है की यहाँ वरिष्ठ कीट-वैज्ञानिक और यात्री किसानों के बीच रति भर भी फ़ासला नही था.  इन पंक्तियों का लिखने वाला तो  डा. सरोज को सुनना व सहेजना भूल मन्त्र-मुग्ध हो वीडियो बनानी व फोटो खीचने ही भूल गया. इसकी स्मृतियों में तो 1981 की साल कीटविज्ञान के प्रारम्भिक कोर्स के प्रैक्टिकल में डा सरोज की शिक्षण-पद्धति ही बार-बार ताज़ा हो आई. गज़ब की शख़्सियत है डा. सरोज जयपाल का. कहीं कोई औपचारिकता नही, कोई खाई नही. सब सहज भाव से. 
               इसके बाद डा. जी ने इन महिलाओं को कीटनाशकों वाला काम करने वाले छोटे से कीट - ट्राईकोग्रामा व फफुन्दीय रोगाणु- बेवरिया बेसयाना को घर पर ही कम खर्च में पैदा करने की तकनीक विस्तार से समझाई. बेवरिया बेसयाना को लेकर एक नई बहस शुरू हो गयी क़ि कीट प्रबंधन में इस रोगाणु का इस्तेमाल क्या स्तनपाईयों के लिए सुरक्षित है? इस पर डा. सरोज जी बोली क़ि इसका इस्तेमाल बिलकुल सुरक्षित है. पर मनबीर ने सवाल उठाया क़ि अटवाल व धालीवाल की किताब "AGRICULTURAL PESTS OF SOUTH ASIA"  के 99वें पेज पर 21वीं लाइन में लिखा है क़ि यह जहरीली फफूंद स्तनधारियों के लिए भी उतनी ही खतरनाक है जितनी कीटों के लिए.  डा. सरोज ने इस बहस को यूँ समेटा कि यह रोगाणु है तो सुरक्षित पर पत्ता नही किन सन्दर्भों में उन्होंने ये बात लिखी है. कभी पढ़ कर ही आपको बत्ताऊँगी!
               यह मालूम होने के बावजूद कि कैंटीन में असल में तो कर्मचारी मिलने ही नही, अगर मिल भी गये तो कहेंगे कि मैडम- दूध नही है,.. आपने पहले क्यों नही बोला?....,  डा.सरोज जयपाल सभी को चाय पिलाने के लिए जबरदस्ती कैंटीन में लेकर गयी. इत्मीनान से कर्मचारी ढूंढे. दूध मंगवाया. चाय का इंतज़ार होने लगा. इन इंतजारी लम्हों का भरपूर फायदा उठाने के लिए महिलाओं ने आपने दुसरे गीत "मै बीटल हूँ.., मैं कीटल हूँ,.... तुम समझो मेरी महता को". को गाना धुरु किया. सभी ने मिलकर इस गाने का लुफ्त उठाया. फिर गरमा-गर्म चाय क़ी चुसकिया ली. अब डा.सरोज जयपाल इस जत्थे को आगे रवाना करने के लिए बस तक छोड़ने आई. इन्हें भावविनी बिदाई देते हुए वायदा किया कि निडाना क़ी महिलाएं अगर उन्हें रात को भी याद करेंगी तो वे रात के बारह बजे भी हाज़िर होंगी.
                                 इसके पश्चात् महिलाओं के इस जत्थे ने पिंजौर का रुख किया. रास्ते में जी.टी.रोड पर एक भोजनालय पर खाना खाया . शाहाबाद से कोई लिंक रोड पकडकर पिंजोर पहुंचे. पिंजौर गार्डन देखकर चंडीगढ़ के लिए रवाना हुए. रात के साढ़े आठ बजे सेक्टर 28 स्थित हरियाणा के पंचायत भवन पहुंचे. पंचायत भवन में इस जत्थे के लिए ठहराने की व्यवस्था करवाने वाले पंजाब सरकार के उपमहाअधिवक्ता  डॉ रणवीर सिंह चौहान मौके पर उपस्थित थे. यहीं कैंटीन में रात्रि का भोजन किया व इसी भवन में रात्रि विश्राम किया. सोने से पहले इन यात्री महिलाओं ने लैप-टाप पर कपास की फसल में इस साल पाए गये मांसाहारी कीटों की स्लाईड देखी.
                                                        24 नवम्बर,10  की प्रात:  पंचायत भवन की कैंटीन में ही नाश्ता कर यह जत्था नंगल डैम व् भाखड़ा डैम देखने के लिए रवाना हुआ. नंगल डैम देखते हुए यह जत्था दिन के एक बजे भाखड़ा बाँध पर पंहुचा. बांध की ऊँचाई व् जल भण्डारण क्षेत्र का विस्तार देख सभी आश्चर्यचकित रह गये. यहीं चाय पार्टी के दौरान सामूहिक निर्णय हुआ कि अब सुंदर नगर वाया नैना देवी चला जाये. नैना देवी यहाँ से 18 किलोमीटर ही है. एक तो यह मिनी बस बूढी अर उपर से इसमें बैठे यात्री पहाड़ी रास्तों के अभ्यस्त नही थे.   नैना देवी पहुँचते-पहुँचते सभी बुरी तरह से थक चुके थे. लेकिन नैना-दर्शन  के लोभ ने इस थकावट को दरकिनार कर दिया. सभी बस से उतरते ही नैना-दर्शनों के लिए सीढियों के रास्ते पहाड़ी की चोटी पर चढने के लिए चल दिए. चढ़ाई तो थोड़ी ही थी पर कसूती खड़ी थी. नीचे आये तो शाम के सवा चार बज चुके थे. पहाड़ो के रास्तों से अंजान ड्राईवर एवं यात्रियों के लिए अब सुंदरनगर के लिए प्रस्थान करना समझदारी नही थी. अत:  यही नैना देवी ट्रस्ट की एक धर्मशाला में रात्रि विश्राम के लिए कमरे बुक करवाए. सामान रखने के बाद इसी धर्मशाला की कैंटीन से चाय का जुगाड़ किया. चाय पीते-पीते अँधेरा हो चूका था. इस धर्मशाला की बाउंड्री से ही अँधेरे में पहाड़ो की रौशनी का नज़ारा लिया. कैंटीन में रात्रि भोजन करने के बाद महिलाओं ने कीट साक्षरता के विभिन्न आयामों पर चर्चा की व् लैप-टाप पर "महिला खेत पाठशाला" के ब्लॉग पढ़े. मिनी ने "कृषि चौपाल' ब्लॉग पर से एक कहानी "बस यूँ ऐ" सभी को पढ़ कर सुनाई. राजबाला तो ये कहानी सुनते-सुनते कहीं खो गयी. रात को ही जब नेट पर सर्फिंग करते हुए शहीद भगत सिंह, बंगा और खटकड़ कलां की बात चली तो इन महिलाओं ने सुंदरनगर जाने की बजाय अगले दिन खटकड़ कलां विज़िट करने की ठानी.
                                                             परिणाम स्वरुप  25 नवम्बर,10 को प्रात: जल्दी उठकर सभी फटाफट तैयार हुए. इस धर्मशाला में नहाने के लिए गर्म पानी की व्यवस्था थी. चाय के साथ स्नैक्स लेकर यह जत्था आनंदपुर साहिब, गढ़शंकर व बंगा के रास्ते शहीदे-आज़म भगत सिंह के गावँ खटकड़ कलां के लिए रवाना हुआ.  अमृतसर-चंडीगढ़ हाईवे पर बंगा से दो किलोमीटर चंडीगढ़ की तरफ  हाईवे पर ही स्तिथ है यादगार संग्राहलय.  यहीं से खटकड़ कलां को पहुँच मार्ग जाता है. इस यादगार संग्राहलय के  प्रांगण में ही शहीद भगत सिंह की  विशाल प्रतिमा लगी हुए है जो दूर से नजर आती है.   यादगार संग्राहलय के हाल में किसानों के इस जत्थे ने दो घंटे लगाये. संग्राहलय के हॉल में मुक्ति-कामि आन्दोलन में अंग्रेजी हकुमत के विरुद्ध झंडा बुलंद करने वाले शहीदों, क्रांतिकारियों व स्वाधीनता सेनानियों के दुर्लभ फोटों हैं, शहीद भगत सिंह के बचपन व परिवार के सदस्यों के फोटों हैं.  इस संग्रालय में शहीद भगत सिंह के बचपन से जुड़ी चीजें, उसके खून से सन्नी मिटटी व एक अंग्रेजी का अख़बार भी संरक्षित हैं. इसमें भगत सिंह के दस्तावेज़ व उनके दस्तक वाली गीता की कापी भी संरक्षित है. 
शहीद भगत सिंह के बचपन व परिवार के सदस्यों के फोटों देखकर ये महिलाएं द्रवित हो उठी और कुछ महिलाओं क़ी आँखों में तो वास्तव में आँसू भी छलक आये. क्रांतिकारियों व स्वाधीनता सेनानियों में सुशीला व दुर्गा भाभी सम्मेत अनेक वीरांगनाओं के फोटो देखकर इन महिला किसानों की प्रतिक्रया थी क़ि हमने तो स्वाधीनता संग्राम में रानी झाँसी का ही नाम सुना था.यहाँ आकर पता चला क़ि हिंदुस्तान की आज़ादी के इस आन्दोलन में महिलाएं भी पीछे नही थी. जिला जींद के खटकड़ गावँ में जन्मी सुदेश का कहना था कि सरजी, हम भी तो आज़ादी क़ी लड़ाई ही लड़ रहीं हैं. अंतर इतना है कि हमारी इन क्रन्तिकारी बहनों ने अंग्रेजी शासन से मुक्ति के लिए जंग लड़ी थी और हम कीटनाशकों से मुक्ति के लिए जदोजहद कर रही हैं. 
"चट्टनी में गोली" वाले क्रन्तिकारी,  क्रांति कुमार का फोटो यहाँ देखकर डा.सुरेन्द्र दलाल ने इन महिलाओं को बताया कि हरियाणा के पानीपत शहर में क्रांति-नगर इसी क्रांति कुमार के नाम पर बसा हुआ. इसी कालोनी में क्रांति कुनार क़ी बेटी उर्वशी व बेटा विनय कुमार रहते हैं. 
संग्रालय के प्रांगन में ही "दाना पानी" नाम से एक निजी कैटरिंग सेवा है. इस भोजनालय पर ही महिलाओं ने आज का लंच ग्रहण किया. दाना-पानी का भोजन साफ- सुथरा एवं स्वाद था व सेवा सराहनीय थी. 
   बाघा बार्डर के लिए रवाना होने के लिए बस में सवार होते ही नन्ही, कमला व प्रकाशी ने एक नया सवाल उठा दिया - अक जी, हमनै फाँसी पर झुलनिये माणस क़ी जीब बाहर लिकड़ी देखी अर् टट्टी भी लिकड़ी देखी पर आज तक खून किसे का लिकड़ा नही देखा. फेर यू मिटटी अर् अख़बार पर भगत सिंह का खून कीत तै लग गया? इसका जवाब इस जत्थे में किसी के पास नही था. यहाँ से बंगा व फगवाडा होते हुए जालंधर पहुंचे. जालंधर से जी.टी.रोड होते हुए अमृतसर पहुचे. सारे रास्ते सड़क पर सरपट दौड़ती मिनी बस की खिडकियों से सड़क के दोनों ओर या तो खरपतवारनासी जहरों से सन्नी हरित क्रांति की हरियाली दिखाई दे रही थी या फिर गावों के रूप में सीमेंट-कंक्रीट के बोझड़े या कस्बों के रूप में सीमेंट-कंक्रीट की बणी या फिर नगरों के रूप में सीमेंट-कंक्रीट के बीड़ ही दिखाई दे रहे थे. अमृतसर पहुँचते ही सबसे पहले गुरु रामदास सराए में रात्रि विश्राम के लिए तीन कमरे बुक करवाए और फिर बिना कुछ खाये-पीये चल दिए बाघा बोर्डर पर परेड देखने के लिए. लेट होने का डर था. हिंदुस्तान व पाकिस्तान के बोर्डर पर परेड देखने का चाव इन महिला किसानों के दिलो-दिमाग पर इस कदर हावी था कि भूख को दिमाग पर हावी नही होने दिया. 28 किलोमीटर के रास्ते में तीन-तीन टोल बैरियर पर ठुकाई के बावजूद शाम को परेड की रस्म अदायगी से पहले ही यह जत्था बाघा बोर्डर पहुँच गया. यहाँ परेड की रस्म देखने के लिए एक खुला थिएटर बनाया हुआ है. इसी की सीढ़ियों पर हमने भी परेड शुरू होने से पहले ही अपनी जगह ले ली. यहाँ दोनों ओर के दर्शकों की ललकार, तालियों की गड़गड़ाहट व नाच-गाना वास्तव में एक रोमांचकारी एवं रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव था. यहाँ दोनों तरफ के सुरक्षा सैनिकों का परेड के रूप में जमीन पर जोर-जोर से पैर पटकना, गजब की कदमताल व पूरे गुस्से में भर कर गेट खोलना- हमे तो  एक तरह से बेमतलब एक-दुसरे को नीचा दिखाने वाला काम ही लगा. बिना एक दुसरे को छुए केवल भाव-भंगिमाओं व शारीरिक-भाषा के बलबूते भी एक-दूजे का क़त्ल किया जा सकता है- यह यहीं आकर व परेड देखकर मालूम हुआ. रास्ट्रीय झंडा झुकाने तक परेड की पूरी रस्म  देख कर व अंग्रेजो के मोबईली मसले में उलझे-उलझे वापिस अमृतसर पहुंचे. अमृतसर में पूछते-पूछते गुरु रामदास सराए में रात्रि के लिए अपना ठिकाना ढूंढा. कमरों में अपना सामान रखते ही खोखे से मँगा कर एक-एक चाय पी. डा.कमल सैनी के सुझाव पर आज रात्रि-भोज लंगर में ही करने का निर्णय हुआ. सामने ही शहीद बाबा दलीप सिंह जी के गुरूद्वारे में लंगर चल रहा था. गुरूद्वारे के प्रांगण में पहुच कर मिनी बस को पार्किंग में खड़ा किया और इसी बस में डा. दलाल व सैनी को छोडकर सभी के जूते रखवा दिए गये. लंगर में दाल-रोटी खा कर वापिस आये तो दोनों डाक्टरों को  उभाने पाया सराए में आना पड़ा.  अंग्रेजो सम्मेत सभी  महिलाओं को बिना बात एक अच्छा खासा मसला मिल गया. कोई कहने लगी अक ठीक होया - घने सयाने बने हांडे थे. कोए कहने लगी- घनी सयानी दो बर पोया करै. राजवंती अर् सरोज  न्यूँ बोली- डा.जी, मैं बड़ी खुश हुई आपके जूते खूने पर. इब तो आप नै नये खरीदने ही पड़ेंगे. नही तो उन पुराने-फटे होया नै ही पहरे हांडे जांदे.
"घणा मायूस होन की जरुरत नही, डा. जी. बीस जनी सा. सौ-सौ रूपये कट्ठे करके दे दिवांगी. दो हजार के नये जूते खरीद लियो बढ़िया से. ऊपर के ल्योगे तो आपके लगैगे."- बिमला अर् अंग्रेजो नै डा. दलाल को दिलासा दी.
                                     26 नवंबर,10 को सुबह नहा धो कर चाय पी और यहाँ से सीधे जलियांवाला बाग़ पहुचे. बाग में पहुँच कर दीवारों पर उन गोलियों के निशान देखे जो जनरल डायर ने 13 अप्रैल 1919 के दिन  यहाँ इक्कठा हुए निहत्थे लोगों पर बिना कोई चेतावनी दिए शाम को 5:15 बजे चलवाई थी. आठ- दस मिनट की गोलाबारी में 1650 राउण्ड फायर किये गये. इस गोला-बारी में 379 लोग मारे गये और हजारों घायल हुए. गोलियों की मार से बचने के लिए सैकड़ों लोग यहाँ एक कुँए में कूद गये. इस कुँए से 120 लाश निकाली गयी थी.
जलियांवाला बाग देखने के बाद यह जत्था लुधियाना के लिए रवाना हुआ. रास्ते में जालंधर पहुचने से पहले ही जी.टी.रोड पर स्थित एक पंजाबी ढाबे पर दोपहर का भोजन किया. इसी ढाबे के प्रांगन में पौधों पर एक मांसाहारी कीट हथजोड़ा नजर आया तो महिलाओं ने इस कीट की विशेषताओं पर गीत गाना शुरू किया व इसकी एक वीडियो तैयार की. यहाँ से हम सीधे लुधियाना स्थित पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के पार्कर हॉउस पहुचे. इस निवास में तो राजपत्रित अधिकारीयों के लिए ठहरने की व्यवस्था है. अत: इन महिला किसानों को इस पार्कर हॉउस में ठिकाना नही मिला. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के पार्कर हॉउस में ठहरने का ठिकाना न मिलने पर डा. दलाल के मन में तो साहिर लुधियानवी ये बोल "  ऐ रहबरे मुल्क -ओ-कोम जरा, आँखें तो उठा,  नजरें तो मिला, कुछ हम भी सुने हमको भी बता" बार-बार मरोड़े मार रहे थे|  इसी क्षण मिनी ने पूछ लिया कि सर, पार्कर की तो स्याही अर पैन देखे और सुने थे! यू पार्कर हॉउस आड़े ही सुना? इस अनपेक्षित सवाल पर तो एकदम डा.दलाल भी चौक गया. पर माड़ा-मोटा जवाब तो देना ही था. यूँ कहन लगा कि मिनी, यूँ हॉउस आला-पार्कर तो हो-ना-हो आर.डब्लू.पार्कर हो सकै सै जो 1954 में राक्फेलर फाऊंडेसन का चेयरमैन था. इस फाऊंडेसन ने द्विपक्षीय वैज्ञानिक निगम की साल हिंदुस्तान के दर्जनों कृषि-स्नातकोत्तर छात्रों को अमेरिका में पी.एचडी. करने के लिए छात्रवृति दी थी. पी.एचडी.का शोध-विषय था-भारत के विभिन सिंचित क्षेत्रों में मिट्टी की उर्वरता.और इसी पृष्ठभूमि में अपने यहाँ कृषि की दशा व् दिशा तय करने के लिए भारत और अमेरिका के विज्ञानिकों को मिला कर एक द्विपक्षीय वैज्ञानिक निगम का गठन हुआ. इस निगम की सिफारिशों पर ही हमारे देश के सिंचित क्षेत्रों में नौ कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना भूमि अनुदान पैटर्न पर पी.एल.480 स्कीम की मदद से हुई. इन नौ कृषि विश्वविद्यालयों में सतलुज, ब्यास व् रावी दरियाओं के जल से सिंचित क्षेत्र में लुधियाना स्तिथ पंजाब कृषि विश्वविद्यालय भी था. इन सबके बीच 1965 में अपने देश में गेहूं का उत्पादन बढ़ाने के लिए लर्मा-रोज़ा, सोनारा-64 व् सोनारा-65 नामक उर्वरक-संवेदी उन्नत किस्मों का 18000 टन बीज आयात किया गया. निसंदेह गेहूं का उत्पादन बढ़ा, उर्वरकों की खेती में खपत बढ़ी. लेकिन साथ-साथ सत्तर के दशक में ही गेहूं की फसल में मंडूसी नामक खरपतवार भी किसानों को ठोसे दिखाने लगा था. अब इस पार्कर-हाउस ने दिखा दिए तो कोई खास बात नही! ठहरने की वैकल्पिक व्यवस्था हेतु इसी कैम्पस में स्थित समेटी के दफ्तर पहुंचे. पर इस संस्था के पास किसानों या प्रशिक्षणार्थियों को ठहराने की व्यवस्था नही मिली. इन महिला किसानों का डा.धवन से संवाद  का सपना तो इतने में ही चकनाचूर हो चुका था. पर फिर भी ठहरना तो था ही. इसी के इंतज़ाम वास्ते यह जत्था पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के निदेशक (विस्तार) महोदय, डा, मुख्यतार सिंह गिल से मिला| इन्होने अगर-मगर के बाद महिला किसानों के इस जत्थे को कैरों किसान सदन के इंचार्ज से मिलने को कहा| निराशा से बोजिल दिल में एक आशा की छोटी सी किरण लिए, अब सारे जने कैरों किसान आवास पहुंचे व् इसके इंचार्ज महोदय से मुलाकात की| इंचार्ज महोदय ने महिलाओं को इस सराय में ठहराने में असमर्थता दिखाई| जब इनसे डा, मुख्यतार सिंह गिल से बात करने के लिए कहा गया तो साहब का जवाब था- आप लोगों की मुलाकात के समय, मैं वहीं था| डा.गिल ने मेरे को लिख कर आदेश तो दिए नहीं| ऐसे में, इन महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेवारी कौन ले| आप मर्दों को जितने चाहो ले आओ, हम यहाँ ठहरने की व्यवस्था कर देंगें| पौने पांच बजने को हैं, अब तो आप जल्दी करके होम साईंस की डीन से मिल लें| वो जरुर किसी होस्टल के कामन-रूम में आप लोगों के लिए रात काटने का जुगाड़ कर देंगी| 
" पूत के पाँ पालने में ही देख लिए| इब आड़े क्यों धक्के खाओ", कमला अर नन्ही नै दखल दिया| महिला किसान क्लबों के गठन में प्रयासरत इस बेस्ट अवार्डी कृषि विश्वविद्यालय में महिला किसानों के ठहरने की व्यवस्था न होने पर हैरान इन महिला किसानों ने गैरटेम होने के बावजूद कुरुक्षेत्र के लिए रवाना होने में ही अपनी भलाई सोची| मनबीर ने कुरुक्षेत्र स्तिथ जैराम आश्रम के व्यवस्थापक से टेलीफोन पर बात की और आज की रात काटने के लिए इस आश्रम में कमरे बुक करवाए| कृषि विश्वविद्यालय से निकलकर यह जत्था ऊनी वस्त्रों की सस्ती खरीदारी के चक्कर में चौड़ा बाज़ार पहुँच गया और यहीं शाम के सात बजा दिए. अब ये जथा रात के अंधेरों को चीरता हुआ लुधियाना से कुरुक्षेत्र के लिए रवाना हुआ. रास्ते में  इस राष्ट्रिय राजमार्ग-१ पर ही कहीं स्तिथ हवेली नामक एक आधुनिक ढाबे पर सांझ का खाना खाया. असली महिला किसानों को अपने यहाँ पहली बार देखकर हवेली का प्रबंधक बड़ा खुश हुआ और उसने हवेली के चाकरों को बड़े प्यार से खाना परोसने की हिदायते दी. वेटरों ने निसंदेह लज़ीज़ खाने की थालियाँ बड़े अदब से अपने इन ठेठ देहाती मेहमानों को परोसी. पर बिमला पंडित को इस लज़ीज़ खाने में रोटी और गँठे के अलावा कुछ भी लज़ीज़ नजर नही आया. इसीलिए शायद हवेली के ताम-झाम से बेफ़िकर बिमला इस थाली से केवल गँठे और रोटी उठाकर ही बड़े मज्जे से खाने लगी. इस नजारे को देखकर प्रतीक्षा में खड़ा चाकर उपेक्षित भाव से बिमला की तरफ देखकर कुटिल मुस्कान बिखेरने लगा.  धरती पर मूत कर सोने वाले इन ग्राहकों से अनभ्यस्त इस वेटर के इस अजीब व्यवहार को किसी ने देखा और किसी ने नही. इस होटल से रवानगी के समय प्रबंधक महोदय द्वारा जत्थे को सड़क तक छोड़ने आते वक़्त प्रति-पुष्टि प्राप्त करने की कौशिश पर जरुर डा,दलाल ने इस गैरमामूली सी घटना का होले से जिक्र किया. 
   यहाँ से रवाना होने के बाद तो मिनीबस राजपुरा होते हुए रात के सवा बारह बजे अम्बाला में सामान्य बस स्टैंड के पास एक चाय की दुकान पर रुक्की. सब ने चाय पी और कुरुक्षेत्र के लिए रवाना हुए. कुरुक्षेत्र पहुँच कर श्री जयराम विद्यापीठ आश्रम में रात्रि विश्राम के लिए कमरे खुलवाए. सभी कान बोचकर सो गये.