Wednesday, July 25, 2012

महिलाओं के साथ दोस्ती

कीट चाहे शाकाहारी हों या मासाहारी दोनों ही किस्म के कीटों ने कीट मित्र महिलाओं के साथ दोस्ती कर ली है। जैसे ही महिलाएं महिला किसान पाठशाला में पहुंचती हैं, वैसे ही कीट महिलाओं के पास आकर  बैठ जाते हैं। बुधवार को ललीतखेड़ा गांव की महिला किसान पूनम मलिक के खेत पर जैसे ही महिलाओं का आगम शुरू हुआ, वैसे ही कीटों ने भी पाठशाला में दस्तक दे दी। पाठशाला शुरू होने से पहले ही सुमित्रा के हाथ पर कातिल बुगड़ा तथा सुषमा के हाथ पर मटकु बुगड़ा आकर बैठ गया। पाठशाला का आरंभ खाप पंचायतों के संचालक कुलदीप ढांडा ने कैप्टन लक्ष्मी सहगल की मृत्यु पर दो मिनट का मौन धारण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर की। ढांडा ने बताया कि कैप्टन लक्ष्मी सहगल नेता जी सुभाष चंद्र बोस की रानी झांसी रेजिमेंट की कैप्टन थी और इन्होंने देश की आजादी के बाद गरीबों के इलाज का बीड़ा उठाया था। उन्होंने बताया कि सहगल ने मृत्यु के तीन दिन पहले तक कानपुर में मरीजों का इलाज किया था। अंग्रेजो ने कहा कि देश को जहर से बचाने के लिए छेड़ी गई इस लड़ाई को वे आखरी सांस तक जारी रखेंगी और यही कैप्टन लक्ष्मी सहगल को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इसके बाद महिलाओं ने कपास के खेत में कीटों का सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण में पाया कि कोई भी कीट पूनम मलिक के कपास के इस खेत में अगले एक सप्ताह हानि पहुंचाने की स्थिति में नहीं है। सुमित्रा  ने बताया कि कातिल बुगड़ा अपने बराबर व अपने से छोटे आकार के कीटों का खून पीकर अपनी वंशवृद्धि करता है। कातिल बुगड़ा शिकार को पकड़े ही उसका कत्ल कर देता है। सुषमा ने बताया कि मटकु बुगड़ा कपास में पाए जाने वाले लाल बनिए का खून पीकर अपना गुजारा करता है। सुषमा ने बताया कि अभी कपास में एकाध ही लाल बनिया आया है, लेकिन लाल बनिए की दस्तक के साथ ही मटकु बुगड़े ने भी कपास में दस्तक दे दी है। गीता ने कपास की फसल में फलेरी बुगड़े के बच्चे व प्रौढ़ देखा। शीला ने सर्वेक्षण के दौरान डायन मक्खी तथा सविता ने गोब की चितकबरी सुंडी के प्रौढ़ को पकड़ा।

कीटों को राखी बांध कर मनाएंगे रक्षाबंधन का पर्व

महिला किसान पाठशाला की महिलाओं ने बताया कि वे रक्षाबंधन के पर्व पर कीटों को पौंची (राखी) बांधकर रक्षाबंधन का पर्व मनाएंगी। रक्षा बंधन पर भाई बहन से राखी बंधवाता है और बहन की रक्षा की सौगंध लेता है, लेकिन इस बार वे कीटों को राखी बांधकर उनकी रक्षा का संकल्प लेंगी। ताकि उनके बच्चों व उनके भाइयों की थाली जहर मुक्त हो सके। 

अनावरण यात्रा के लिए दिल्ली जाएंगी महिलाएं

सर्वेक्षण के बाद कीट बही-खाते की रिपोर्ट तैयार करवाती महिला।
कृषि अधिकारी डा. सुरेंद्र दलाल ने बताया कि कृषि विभाग की तरफ से महिलाओं को 27 जुलाई को दिल्ली में लगने वाले कृषि मेले की अनावरण यात्रा पर ले जाया जाएगा। ताकि कृषि मेले में महिलाएं ज्ञान प्राप्त कर सकें और इन महिलाओं में कृषि के प्रति और रुचि पैदा हो।

Wednesday, July 18, 2012

पाठशाला का पाँचवां सत्र

नजारा है ललीतखेड़ा गांव की महिला किसान पाठशाला का। पाठशाला की शुरूआत के साथ ही किसान कविता ने महिलाओं को एक नई किस्म का कीट दिखाया, जिसका पेट भिरड़ जैसा था व् पंख ड्रैगन फ़्लाई जैसे। इस कीट को निडाना व ललीतखेड़ा की महिलाओं ने खेतों में पहली बार देखा था। कीट को देखते ही नारो पूछ बैठती है आएं यू डांगरां की माच्छरदानी आला कीड़ा आड़ै खेतां में के कैरा सै। इसे-इसे कीड़े तो डांगरां की माच्छरदानी में घैने पाया करें सैं। कविता ने नारो की बात को बीच में ही काटते हुए महिलाओं को नए कीट के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि यह नए किस्म की लोपा मक्खी है जो खान-पान के आधार पर मासाहारी होती है। इस मक्खी की तीन जोड़ी पैर व दो जोड़ी पंख होते हैं। अकसर किसान इसे हैलीकॉपटर के नाम से पुकारते हैं। कविता ने बताया कि यह धान में लगने वाले तना छेदक, पत्ता लपेट के पतंगों का उडते हुए शिकार कर लेती है। कविता ने कहा कि जब पतंगे नहीं रहेंगे तो अंडे कहां से आएंगे और अंडे ही नहीं होंगे तो सुंडी नहीं आएंगी। सविता ने बताया कि लोपा मक्खी अपने अंडे धान के खेत में खड़े पानी में देती है। पानी में पैदा होने वाले इसके बच्चे भी मासाहारी होते हैं। शीला ने बताया कि इसे जिंदा रहने के लिए खाने में अपने वजन से ज्यादा मास चाहिए। शीला की बात सुनकर नारों की आंखें खुली की खुली रह गई। नारो ने पूछा आएं फेर यू खेतां का कीड़ा है तो माच्छरदानी में कै करया कैरै सै। कृष्णा ने नारो के सवाल का जवाब देते हुए बताया यू कीड़ा उड़ै माच्छरां नै खाया करै सै। इस बात पर बहस करने के बाद महिलाओं ने कीट बही खाता तैयार करने के लिए कपास के पौधों का सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण के दौरान महिलाओं ने पाया कि कपास की फसल में पाने वाले शाकाहारी कीट सफेद मक्खी, हरा तेला, चूरड़ा, मिलीबग कोई भी  फसल में हानि पहुंचाने की स्थिति में नहीं था। रही बात मासाहारी कीटों की, कपास की फसल में कोई भी पौधा ऐसा नहीं था, जिस पर फलेरी बुगड़े के बच्चे (निम्प) मौजूद न हों। शीला ने बताया कि फलेरी बुगड़े के बच्चे शाकाहारी कीटों का खून पीकर गुजारा करते हैं। कीट सर्वेक्षण के आधार पर तैयार किए गए बही खाते से महिलाओं को कपास की फसल में किसी भी प्रकार के कीटनाशक के प्रयोग की जरुरत महसूस नहीं हुई। खाप पंचायत के संयोजक कुलदीप ढांडा ने कहा कि पृथ्वी पर साढ़े तीन करोड़ साल पहले पौधे विकसित हुए थे और पौधों पर गुजारा करने के लिए कीट


फसल में पाए गए लालड़ी कीट का फोटो
आए थे। जबकि किसानों ने तो खेती की शुरूआत के साथ ही पौधों पर कब्जा करना शुरू किया है। कीटों व किसानों की इस अनावश्यक जंग में निश्चित तौर पर कीटों का पलड़ा भारी है। क्योंकि कीटों में इंसान की अपेक्षा प्रजजन करने की क्षमता अधिक व खुराक की जरुरत कम होती है। पंखों की वजह से कीटों के बच निकलने की संभावना भी ज्यादा रहती है।

किसान हरे नहीं पीले हाथ करने की चिंता करें

किसान पाठशाला की मास्टर ट्रेनर शीला ने कहा कि धान की फसल में लोपा मक्खी आने के बाद किसानों को धान में फूट के नाम पर डाली जाने वाली कीड़े मारने वाली हरी दवाई से हरे हाथ करने की जरुरत नहीं है। इसकी चिंता तो किसान लोपा मक्खी पर छोड़ अपने विवाह योग्य पुत्र-पुत्रियों के हाथ पीले करने की चिंता करें।
अन्य फसलों के कीटों ने भी महिलाओं से बनाई दोस्ती
 किसान पाठशाला में खाप प्रतिनिधि के साथ विचार-विमर्श करती महिलाएं।
कीटों के प्रति महिला किसानों के सकारात्मक रवैये को देखकर दूसरी फसलों के कीटों ने भी महिलाओं से दोस्ती बना ली है। बुधवार को ललीतखेड़ा में आयोजित महिला किसान पाठशाला में कीट सर्वेक्षण के दौरान लालड़ी व अखटिया बग भी महिलाओं के बीच आ गए। कविता ने बताया कि लालड़ी कीट अकसर घीया, तोरी, कचरी की बेलों पर पाया जाता है। यह कीट बेल के पत्ते खाकर अपना गुजारा करता है। अखटिया बग औषधीय आख के पौधे पर पाया जाता है। यह कीट भी रस चूसकर अपना जीवन चक्र चलाता है।



Wednesday, July 4, 2012

‘पाठशाला’ में पढ़ रही कीड़ों की पढ़ाई


सुबह के आठ बजे थे नजारा था गोहाना रोड पर स्थित ललीतखेड़ा गांव के पास का। कुछ महिलाएं सिर पर पानी का मटका लिए पूरे उत्साह के साथ गीत गुणगुनाती खेतों की तरफ जा रही थी। गीत के बोल थे ‘किड़यां का कट रहया चाला ऐ मैंन तेरी सूं देखया ढंग निराला ऐ मैंन तेरी सूं’ और इन महिलाओं के हाथों में खेती के औजारों की जगह थे कॉपी, पैन व् मेग्निफाईंग ग्लास। यह नजारा वाकई में चौकाने वाला था। ये महिलाएं खेत में खेती के काम के लिए नहीं बल्कि कीटों की पढ़ाई पढ़ने के लिए जा रही थी। इन महिलाओं को कीट ज्ञान देने का जिम्मा उठाया है निडाना गांव की महिला कीट पाठशाला की मास्टर ट्रेनर महिलाओं ने। कीटों की पहचान में माहरत हासिल करने के बाद अब इन महिलाओं ने ललीतखेड़ा गांव की तरफ अपनी टीम का रुख किया है। इन दिनों कीट पाठशाला की ये मास्टरनियां ललीतखेड़ा गांव की महिलाओं को फसल में पाए जाने वाले मासाहारी व शाकाहारी कीटों की पहचान कर कीटनाशकों से मुक्ति के गुर सीखा रही हैं। ललीतखेड़ा की महिला किसान पूनम मलिक के खेत को पाठशाला के लिए चुना गया है। सप्ताह के हर बुधवार को इस खेत पर महिला किसान पाठशाला का आयोजन किया जाता है।

कीटों के साथ-साथ पढ़ाया जाता है अनुशासन का पाठ

महिला किसान पाठशाला की सबसे खास बात यह है कि इस पाठशाला में कीटों के पाठ के साथ-साथ महिलाओं को अनुशासन का पाठ भी पढ़ाया जाता है। ताकि सभी महिलाएं समय पर खेत में पहुंच सकें और उनकी दिनचर्या न डगमगाए। बुधवार को जब ललीतखेड़ा की यशवंती पाठशाला में लेट पहुंची तो मास्टर ट्रेनर अंग्रेजों ने लेट आने पर उसकी खूब खिंचाई करते हुए उससे लेट आने का कारण पूछा। अंग्रेजो के सवाल का जवाब देते हुए यशवंती ने बताया कि जब वह सुबह आठ बजे घर का कामकाज निपटाकर पाठशाला में आने के लिए चली तो घर पर कुछ मेहमान आ गए। मेहमानों की आवभगत में उसे पाठशाला में आने में देर हो गई। 

कीटों की भी होती खाप पंचायत

बराह कलां बारहा प्रधान कुलदीप ढांडा जब महिला किसान पाठशाला में पहुंचे तो पाठशाला की प्रशिक्षु शीला मलिक ने कहा कि ढांडा साहब खाप पंचायत सिर्फ मानस-मानसों की नहीं किड़यां की भी होवै सै। देखो पिछली बार तो दूसरे हथजोड़े ने आपका स्वागत किया था और इस बार कीटों की खाप के प्रतिनिधि दूसरा हथजोड़ा आपके स्वागत के लिए आया है।

पैदल ही तय करती हैं तीन किलोमीटर का सफर 

 निडाना गांव की मास्टर ट्रेनर महिलाओं में कीट ज्ञान की अलख जगाने का बहुत चाव है। इसलिए लिए तो वो निडाना से ललीतखेड़ा तक आने के लिए किसी व्हीकल का भी सहारा नहीं लेती हैं। झुलसा देने वाली इस गर्मी में वो निडाना से ललीतखेड़ा तक के तीन किलोमीटर के सफर को पैदल ही तय कर लेती हैं। इस सफर के बाद उन्हें घर का कामकाज भी निपटाना पड़ता है।

कीटों पर तैयार किए हैं गीत

 पाठशाला में बही-खाते में कीटों की संख्या दर्ज करवाती महिला।

कीटों की ये मास्टरनी केवल अध्यापन का कार्य ही नहीं करती। अध्यापन के साथ-साथ ये महिलाएं लेखक व गीतकार की भूमिका भी निभाती हैं। अन्य लोगों को प्रेरित करने के लिए इन महिलाओं ने कीटों के पूर जीवन चक्र की जानकारी जुटाकर उनपर गीतों की रचना भी की हैं। जिनमें प्रमुख गीत हैं:
 किड़यां का कट रहया चालाए ऐ मैने तेरी सूं देखया ढंग निराला ऐ मैने तेरी सूं।  
म्हारी पाठशाला में आईए हो हो नंनदी के बीरा तैने न्यू तैने न्यू मित्र कीट दिखाऊं हो हो नंनदी के बीरा।

मैं बीटल हूं , मैं कीटल हूँ।। तुम समझो मेरी महता को ।। 

Wednesday, June 20, 2012

गुहांड में खेत पाठशाला- पहला सत्र!

 1868 में निडाना से आये लोगों ने ही चिराग़ जलाये थे ललित खेड़ा में! इसीलिये इनमें छोटे-बड़े का रिश्ता है. शायद इसीलिए बड़े गावं की कीट कमांडो महिलाओं ने अपने छोटे गावं की महिलाओं को कीट ज्ञान से लैस करने की ठानी. आज जून की 20 तारीख को सुबह के आठ बजे शुरुवात 

Sunday, March 4, 2012

अंतर्राज्य अनावरण यात्रा-II

इस सदी के साल बारह की चौबीस फरवरी को कलेवार सी निडाना गावं से महिलाओं का एक जत्था पांच दिन की  अंतर्राज्य अनावरण यात्रा पर निकला। कृषि विभाग द्वारा आत्मा स्कीम के अंतर्गत प्रायोजित इस जत्थे में निडाना, निडानी व् ललित खेड़ा से वो महिलाएं थी जिन्होंने कीट साक्षरता अभियान में किसी न किसी रूप में भागेदारी की थी। कृषि विभाग की तरफ से इस यात्रा के लिए कृषि अधिकारियों डा.सुरेन्द्र दलाल व् डा.कमल सैनी को जिम्मेवारी सौंपी गयी तथा महिला किसानों व् उनके परिवार वालों की ओर से उनके कीट प्रशिक्षकों श्री रणबीर मलिक व् मनबीर रेड्हू को इस अनावरण यात्रा की कमान के लिए जत्थे के साथ भेजा गया। सुगम एवं सुविधाजनक यात्रा के लिए ह्मेटी जींद की मिनी बस किराये पर ली गई जिसका किराया मैदानी भागों में यात्रा के लिए महज 16  रुपये प्रति किलोमीटर तथा पहाड़ी क्षेत्रों में 20  रुपये प्रति किलोमीटर ही था।
     गावं से रवानगी के साथ ही महिलाओं ने अपने निजी अनुभवों व् कीटों से सम्बंधित गीत गाने शरू किये। गीत गाते व् सुनते हुए कब पिलुखेड़ा पहुँच गये, किसी को मालूम ही नही पड़ा। जमनी अड्डे पर पहुचने से पहले ही अनारों ने सभी को अपने पीहर जामनी में चाय के लिए हाथ जोड़कर निमन्त्रण देना शुरू किया। वक़्त के तकाजे को मध्य नजर रखते हुए जत्था इस निमन्त्रण को स्वीकार नही कर सका। पानीपत की तरफ बस का मुहं होते ही नारों ने गाना शुरू किया, " निडाना-खेड़ा में कोए छोरी ना ब्याहियों, लम्बी सीम बताई..."  फिर यात्रा पर निकलते समय घर के सदस्यों द्वारा उपहारों की अपील व् स्वयं की असमर्थता पर मार्मिक गीत गाया। पानीपत में सनौली रोड पर पहुँचने पर मनबीर व् रणबीर ने महिलाओं के लिए चल-अल्पाहार का प्रबंध किया। पानीपत से निकलते ही यह जत्था पानीपत की तीन महशूर लड़ाईयों की याद में बने युद्ध स्मारक स्थल को देखने काला अम्ब पहुंचा। पानीपत की इन तीनों लड़ाईयों में दोनों तरफ की फौजों के लाव-लश्कर व् तामझाम की जानकारी हासिल कर महिलाएं आश्चर्यचकित रह गई व् राज की हवस में हुए बेमतलब कत्लोगारत को लेकर इनका मन भारी हो गया। इस भारी मन के साथ ही दिन के 12 :00  बजे  सनौली गावं पार करके बस में बैठे-बैठे ही जमुना के दर्शन किये और इसको पार करके उत्तर प्रदेश में प्रवेश किया। सड़क के दोनों ओर लहलाती गन्ने और गेहूं की फसलों को निहारते यह जत्था कैराना बाईपास होते हुए झोटा-बुग्गियों के लिए जाने जानेवाले कस्बे शामली में पहुंचा। जगह-जगह पर जाम। कस्बे को पार करने में ही दो घंटे लग गये।  पग-पग पर यातायात बाधाओं को पार करने में मिनीबस में बैठे-बिठाये अनावरण यात्री तो बोर हुए ही हुए, बूढी बस स्वयम भी थक गयी। पग-पग पर आगे सरकने के लिए धक्के मांगने लगी। ख़ैर कैसे भी शामली से मुज्ज़फरनगर को जाने वाली सड़क पकड़ी। ओर इसी मार्ग पर बघरा में सड़क किनारे शिव शक्ति ढाबे पर दोपहर का भोजन करने के लिए बस रोकी। दिन के ढाई बज चुके थे। सभी ने इत्मिनान से भोजन किया। भोजन साफ सुथरा व् स्वादिष्ट था। होटल का भोजन पचाने के लिए ट्रक ड्राईवरों की तर्ज़ पर चाय की चुस्कियां ली। ओर बस में बैठ लिए। बस ने स्टार्ट होने में आनाकानी की। शायद शामली वाली थकान अभी उतरी नही थी। धक्का लगाते ही वो भी चल पड़ी। बघरा में बस को मिस्त्री से चेक करवाया गया। बघरा से निकलते ही नारों ने फिर तान छेड़ी, "शीशम का मेरा कुर्ता.. कीकर का मेरा घाघरा...।"  मुज़फ्फरनगर की बाईपास से दिल्ली-हरिद्वार राष्ट्रिय राजमार्ग पकड़ा। रूडकी पहुँचते-पहुँचते दिन छुप चूका था। रात के अँधेरे में रौशनियों से जगमगाते शहर रूडकी को बीचों -बीच पार करते हुए  दिल्ली-हरिद्वार राष्ट्रिय राजमार्ग पर ही यहाँ से कोई 10 -12  किलोमीटर दूर पतंजली योगपीठ फेज़-II के गेट पर रुके। डा.कमल सैनी व् मनबीर पूछताछ के लिए अंदर गये। बड़ा तामझाम समय तो लगना ही था।  इसी समय रात्रि के पश्चिमी आसमान में तीज के चंद्रमा को बृहस्पति व् शुक्र ग्रह घेरे हुए थे। गज़ब का नजारा था। डा.दलाल ने सभी का ध्यान इस और दिलाया। ऊपर नजर करते ही सुमित्रा बोली,"यु थोडा सा ऊपर देखों- हिरणी रही।" "हाँ, सुमित्रा सही पिछाणी। आपने बूढ़े न्यू कहा करते - हिरणी नै काढ़े कान- मूर्खा बोवै धान। मतलब यु की पहर के तड़के रात्रि के पूर्वी आसमान में हिरणी देखाई देनी शुरू होने पर धान की बीजाई का समय निकल चूका।"  रणबीर पुछन लगा अक डा.साहब वा भूरी तारी कौनसी सै? जिसने देख के मेरा बाबु कोल्हू में ज़ोट भरन जाया करदा। "तेरा बाबु के म्हारी माँ अर सासु तक न्यूँ कहा करती उठ लो ऐ, तारा लिकड़ आया।"- कई जनी एकदम चीलाई। "कोई बात नही। यु जो चाँद के निचे खूब चमकन लाग रहा सै-शुक्र ग्रह सै। इसी को भूरी तारी कहा करते। तारा डूब गया- इब रिश्ते कोन्या होवें वाला तारा भी यू शुक्र ग्रह ही होता है। साल में दो बार डूबा करै। गर्मियों में सूरज छिपने के बाद पश्चमी आसमान में तथा सर्दियों में सूरज निकलने से पहले पूर्वी आसमान में दिखाई देता है।" डा.दलाल नै बात आगे बढ़ाई। यु चाँद अर हिरणी के ठीक बीच में देखो- लाल सा तारा। इसने रोहिणी नक्षत्र कहा करै। यु वृष राशी का नक्षत्र सै। आच्छा, न्यूँ बताओ अक महीने में चाँद कितनी रातों को नजर आता है?
  "इसमें के मुश्किल सै। पंद्रह दिन दिखेगा अर पंद्रह दिन कोन्या दिखै।", मिनी के साथ-साथ कई आवाज़ आई।
"ना तो,   यु चाँद महीने में अठ्ठाइस रात दिखाई दिया करै। हर रात किसी न किसी चमकीले तारे के पास होता है। इन्हें ही नक्षत्र कहते हैं। पुरे 28 नक्षत्र। 12  नक्षत्रों के नाम तो महीनों के नाम पर ही हैं। पूर्णमासी के दिन इसी नक्षत्र के पास होता है चाँद। जैसे चैत्र माह की पूर्णमासी के दिन चाँद चित्रा नक्षत्र के पास होगा।", डा. अपनी बात आगे बढ़ा ही रहा था कि इतने में मनबीर व् डा कमल सैनी ने सुचना दी कि पतंजली योगपीठ फेज़-ई में ठहरने की व्यवस्था हो गयी है। रात्रि विश्राम के लिए इस योगपीठ के ब्लाक न.3 में कमरे बुक करवाए। बस पार्किंग में खड़ी की और ब्लाक न. III में अपने अपने कमरे संभाले। हाथ-मुहं धोये। और खाने के लिए इस कैम्पस में स्थापित प्रसादम नामक भोजनालय में पहुंचे। ज्यादातर यात्रियों ने खाना खाने की बजाय योगगुरु रामदेव के यहाँ जलेबी खाना व् दूध पीना ही पसंद किया। जलेबियों का स्वाद तो हरियाणा में घरवालों से छुपकर स्कूल या बनी में मलंगों द्वारा तैयार किये जाने वाले मालपुड़ों जैसा ही था। इसके बाद कैम्पस में चहल कदमी की व् ब्लाक न. 3 में पहुँच गये। सभी यात्री दो ग्रुपों में कम्प्यूटर पर कीट की जानकारी के लिए दो कमरों में इक्कठे हुए। रणबीर व् मनबीर ने इन महिलाओं के कीट ज्ञान में इजाफा करने की जिम्मेवारी संभाली। पुरे दो घंटे चला यह सैसन। इसके बाद सभी अपने-अपने कमरों में सोने चले गये।
 

Saturday, July 23, 2011

छात्र कीट पाठशाला का पहला सत्र !

जुलाई महीने की तेईस तारीख सुबह के आठ ही बजे हैं कि महिला खेत पाठशाला की मीना मलिक, बिमला, गीता, सरोज, राजवंती, कमलेश व् अंग्रेजों रणबीर मालिक के साथ मास्टर ट्रेनर की अपनी ऐतिहासिक  जिम्मेवारी निभाने कपास के खेत में पहुँच चुक्की हैं. अन्य महिलाओं की तरह इन्हें भी सुबह चार बजे उठकर न्यार-फूस, धार-डौकी, दूध बिलौना, गोबर-पानी व् बच्चों के लिए भोजन पकाने आदि अनेक कार्य करने होते हैं. इतने सारे काम निपटा कर इस जहर मुक्ति के काम को आगे बढ़ाने के लिए स्कूली बच्चों को कीट ज्ञान प्रदान करने लिए यहाँ पहुंचना ऐतिहासिक  नही तो और क्या है?
ठीक साढ़े आठ बजे डेफोडिल पब्लिक स्कूल, निडाना के 35 छात्र एवं छात्रा भी अपनी अध्यापिकाओं श्रीमती कांता व् सीमा मलिक के नेतृत्व में कपास के इस खेत में पीपल के नीचे पहुँच जाते हैं. ठीक इनके पीछे-पीछे इसी स्कूल के सह-संचालक श्री विजेंद्र मलिक व् प्राचार्य श्री ज्ञानी राम भी यहाँ पहुँच जाते हैं.
श्री रणबीर सिंह मलिक ने इस कीट पाठशाला के आयोजन व् उद्देश्यों के बारे में बच्चों को विस्तार से बताया. मीणा मलिक ने पाठशाला के लिए बच्चों का पंजीकरण किया. पांच-पांच बच्चों के सात समूह बनाये गये जो निम्नांकित थे.

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बच्चों के सात ग्रुप और इतने ही मास्टर ट्रेनर व् तीन स्कुल के अध्यापक. सभी ने कपास के खेत में ग्रुपों में जाकर ध्यानपूर्वक पौधों एवं कीटों का अवलोकन व् निरिक्षण किया. सभी सात के सात ग्रुपों ने दस-दस पौधों के तीन-तीन पत्तों पर क्रमवार सफ़ेद-मक्खी, तेला व् चुरड़े के केवल निम्फों की गिनती की व् अपनी-अपनी कापी में नोट किया. इसके साथ-साथ प्रत्येक पौधे पर दुसरे सभी कीटों की गिनती की व् इसे भी कापी में नोट किया. "ये क्या? देखो मैम", रेनू अचानक चिल्लाई.
'कुछ नही, ग्रास होपर है." विज्ञानं अध्यापिका विवेक ने तपाक से जबाब दिया.
इतना सुनते ही बिमला मुस्करा कर बोली, "ना मैडम ना, यू तो हथजोड़ा सै- गीदड़ की सुंडी आला. हमने तो इस पर एक गीत घड़ राख्या सै. मांसाहारी कीड़ा सै. अपनी कपास की फसल में बहुत सारे कीड़ों को खा-पीकर ख़त्म करेगा. अंग्रेजी में इस नै के कहा करै- वो डाक्टर जी तै पूछ लो. मनै तो स्कूल की पछीत भी नही देख राखी."
       राहुल वाले ग्रुप के उत्प्रेरक रनबीर मलिक के काना में जब ये बात पड़ी तो कहन लगा कि अंग्रेजी में तो इसनै प्रेयिंग मेंटिस कहा करै. मेरी दादी इस कीड़े की अंडेदानी को चीथड़े में बाँध कर ताक में रखती थी. वो इस अंडेदानी का के करा करै थी- इसका मनै भी नही बेरया. किसानों द्वारा धीरे से कीड़ों के ज्ञान को बच्चों की तरफ सरकाने के इस लाजवाब तरीके पर डॉ.दलाल भी हैरान था.
इसके बाद सभी ग्रुपों ने खेत के एक कोने में खड़े पीपल की छाँव में बैठकर अपनी इस कारवाई को चार्टों पर उतारा व् बारी-बारी से ग्रुप लीडरों ने चार्टों की मदद से सबके सामने पेश किया. 
                       सात के सात ग्रुपों द्वारा रिपोर्ट किये गये कीड़ो की संख्या को जोड़ा गया व् प्रति पत्ता औसत निकाली गयी. हरे तेले की 1.3, सफ़ेद माखी की 1.9 व् चुरड़े की 2.7 पाई गयी. यह औसत सत्तर पौधों के तीन-तीन पत्तों पर आधारित थी. सैम्पल साईज के कारण इस पर भरोसा ना करने का भी कोंई कारण नही था. कीड़ों की यह औसत संख्या उनके हानि पहूचाने के स्तर से काफी नीचे थी.
आज बच्चों ने इस खेत में भान्त-भान्त की वो मकड़ियाँ भी देखी जो घरों में दिखाई नही देती. एक छोटी सी मकड़ी को तेले का चूरमा बनाते हुए भी बच्चों ने देखा. भावना ने चुटकी ली," सर, मकड़ी के शारीर के तो दो ही भाग है. फिर इसे कीड़ों की श्रेणी में कैसे रखेंगे?"
   इतनी सुनकर कमलेश ने आगे बात बढ़ाई अक इसकी चार जोड़ी टांग से जबकि कीड़ों की तीन जोड़ी. इन मकड़ियां नै आपां जनौर कह कर गुज़ारा कर लेवां, इसमें ही सब कुछ आ जा सै. हाँ, इतना जरुर याद रख ले अक ये सारी मकड़ी अपने खेतों में कीटों को खा-पीकर जिन्दा रहती है. दस तरह की तो मैने ही अपने खेत में देख ली. अचूक किस्म की पेस्टीसाईड(कीड़ेमार) सै - ये मकड़ियां.
" दो ही घंटे के लिए हैं, हमारे छात्र आपके पास", ज्ञानी राम ने वायदा याद दिलाया. बस सब कुछ बीच में छोड़कर, फटाफट बिमला द्वारा लाया गया बाकुलियों के रूप में कीट-प्रसादा सभी को बांटा गया. बिमला द्वारा तैयार इस कीट-प्रसादे में कंडेसर का नमक अर तीखी मिर्च भुलाये नही भूलेंगी, हम्में.

Saturday, July 16, 2011

महिला खेत पाठशाला की दुसरे साल में नई शुरुवात !

  आज 16 जुलाई,2011 को  निडाना गाम की महिला खेत पाठशाला की दुसरे साल में एक नई शुरुवात के बीज बोए गये. रा.व्.मा. विद्यालय, डिफेंस कालोनी, जींद की विज्ञानं अध्यापिका श्रीमती सुशीला अपनी छात्राओं ममता, पिंकी व् प्रियंका के साथ कृषि विकास अधिकारी, निडाना के कार्यालय पहुंची. इन्होने कृषि विकास अधिकारी को बताया कि वे अपने भोजन में लगातार बढती जहर की मात्रा को लेकर बहुत चिंतित हैं तथा साथ में ही भुगतभोगी भी. वे समझती हैं कि मानव के लिए यह आत्मघाती परिस्थिति फसलों में कीट नियंत्रण के लिए कीटनाशकों के अनावश्यक एवं अंधाधुंध प्रयोग के कारण ही पैदा हुई हैं. कीटनाशकों के अनावश्यक एवं अंधाधुंध प्रयोग की बात छोड़िये अब तो सुना है कि कपास की फसल के लिए ऐसे बीजों का प्रचलन भी हमारे यहाँ आम हो चला है जिनके जरे-जरे में जहर होता है. आप इन्हें बी.टी.काटन कहते हैं. इसी लिए अपने पर्यावरण व् भोजन सुरक्षा के वास्ते हमने एक लघु परियोजना के तहत बी.टी.काटन के खेत में कीड़ों की वस्तुस्तिथि जानने के लिए अध्यन की ठानी है जबकि दूसरी परियोजना
कांग्रेस घास पर कीड़ों की जानकारी लेने के बारे में है.
  निडाना के कृषि विकास अधिकारी डा.सुरेन्द्र दलाल ने तुरंत इस टीम की मुलाक़ात महिला खेत पाठशाला की एक होनहार सदस्य श्रीमती अनीता मलिक से करवाई. अनीता ने अपने इन मेहमानों के लिए फ़टाफ़ट जलपान का जुगाड़ किया व् इसी दौरान अपने  पति श्री रणबीर सिंह तथा   अपनी जेठानी श्रीमती बिमला मलिक से बातचीत की. इस टीम के आने का प्रयोजन बताया. आगुन्तक टीम अनीता, बिमला व् रणबीर सिंह के साथ गोहाना रोड पर इनके कपास के खेत में पहुंचे और कीड़ों का अवलोकन व् निरिक्षण शुरू किया. अपने पड़ौस में
अन्य स्कूल के छात्रों की इस अप्रत्यासित कारवाई को देख कर डेफोडिल पब्लिक स्कूल, निडाना के सहसंचालक श्री विजेंद्र मलिक व् प्राचार्य श्री ज्ञानी राम शर्मा भी खेत में आ पहुंचे. इस कार्यवाही की पूरी जानकारी जुटाई. इन्होने इस टीम को काम निपटाने के बाद स्कूल में जलपान का निमंत्रण दिया. साढ़े तीन घंटे बी.टी.काटन के खेत में कीड़ों का अध्यन कर यह छात्रों एवं किसानों की टीम डेफोडिल पब्लिक स्कूल के कार्यालय में जलपान के लिए पहुंची. जलपान के दौरान ही स्कूल के सहसंचालक श्री विजेंद्र मलिक ने टीम के सामने उनके छात्रों के लिए भी प्रत्येक शनिवार को सुबह आठ से दस बजे तक इस कीट पाठशाला के आयोजन का प्रस्ताव पेश किया. निडाना गावं के इन तीन किसानों ने प्रस्ताव के माध्यम से
आई इस रोमांचकारी चुनौती को सह हर्ष स्वीकार किया. गावं में पहुँचते ही इन्होने अंग्रेजो की मदद से चार बजे महिला खेत पाठशाला की सभी सदस्यों की मीटिंग बुलाई. इस बैठक में डेफोडिल पब्लिक स्कूल, निडाना के छात्रों के लिए कीट पाठशाला के संचालन की बातचीत रखी और इसके लिए मास्टर ट्रेनरों के रूप में काम करने के लिए महिला किसानों से नाम मांगे गए. मीना मलिक, सरोज, कमलेश, बिमला, गीता, अंग्रेजो व् राजवंती ने इस काम के लिए अपने नाम लिखवाए और अगले शनिवार को 23 जुलाई की सुबह साढ़े आठ बजे प्रयोगाधीन खेत में पहुँचने का वायदा किया.